कोरबा (नईदुनिया प्रतिनिधि)। पसान रेंज से निकल कर जटगा रेंज पहुंचे 13 हाथियों ने गुरूवार की रात मातिन के आश्रित ग्राम लोड़ीबहरा और बोदराडांड़ में जमकर उत्पात मचाया। बारिश के दौरान रात में हाथियों ने चार मकानों को ध्वस्त कर दिया। घर में रहने वाले ग्रामीणों ने भाग कर जान बचाई। घर से बेघर हो चुके प्रभावितों को मातिन पंचायत में ठहराया गया है। हाथियों के आने के की समय पर जानकारी नहीं मिलने से लोग असुरक्षा के साए में जीवन बसर करने को मजबूर हैं।

कटघोरा वनमंडल के पसान वन परिक्षेत्र में विचरण कर रहे हाथी अब अलग-अगल दलों में बंटकर जटगा, केंदई और एतमानगर रेंज में उत्पात मचा रहे हैं। गुरूवार की रात ग्राम मातिन के आश्रित मोहल्ला लोड़ीबहरा में उस समय हड़कंप मच गया जब 12 हाथियों के दल ने राजू लाल धनवार व बुधवरिया बाई धनवार के मकान को ध्वस्त कर दिया। हाथी आने का एहसास होते ही ग्रामीण व उनके स्वजनों किसी तरह पिछले दरवाजे से निकलकर जान बचाई। वन विभाग ने दोनों परिवार के लिए ठहरने की व्यवस्था की है। इसी प्रकार विमला यादव व एक अन्य ग्रामीण के मकान को भी आंशिक नुकसान पहुंचाया है। बताना होगा कि हाल ही में मानसून की शुरूआत हुई है। चारा की तालाश में तेजी से जगह बदलने लगे हैं। पखवाड़े भर से तीन वन परिक्षेत्र में घूम रहे दल अभी तक 14 मकान को तोड़ चुके हैं। गुरूवार को जटगा रेंज के मातिन में नुकसान पहुंचाने के बाद अभी बोदरा डांड़ हैं। बताना होगा कि जंगल में चार, गुजा, बांस हाथियों का मुख्य प्रिय भोजन है। दल की बढ़ती संख्या के लिहाज चारा भी कम पड़ने लना है। दूसरी वजह यह भी है कि चार को वनोपज के तौर पर संग्रहित कर लिया जाता है। इसी तरह बांस के तैयार होने के पहले करील के रूप में उसका उपयोग कर लिया जाता है। ऐसे में पर्याप्त चारा जंगल में नहीं हो रहा।

पांच बीट में पदस्थ नहीं हैं वनपाल

कटघोरा वनमंडल में 35 हाथियों के दल इन दिनों दो टुकडियों में बंट गए हैं। इनमें 18 हाथी केंदई और और 17 अभी पसान के जंगल में भ्रमण कर रहे हैं। इसी तरह जटगा रेंज में भी वनपाल की कमी है। दिन के समय हाथी एक ही जगह में रहते हैं। शाम होते ही टुकड़ियों मे बंटकर एक से दूसरे स्थान पलायन करते है। बताना होगा कि सबसे प्रभावित वन परिक्षेत्र पसान 16 बीट में बंटा है। यहां पांच बीट में वनपाल की नियुक्ति नहीं हुई है। विस्तृत क्षेत्र में बंटे परिक्षेत्र के हाथी प्रभावित को सुरक्षित स्थान पर ले जाने के लिए एक वाहन उपलब्ध नहीं है।

12 से बढ़ कर संख्या हो चुकी है 58

वनपरिक्षेत्रों में हाथियों की संख्या लगातार बढ़ रही हैं। पांच साल पहले हाथियों का दल 12 से 14 की संख्या एक ही जंगल में विचरण करते थे। कालांतर में इनकी संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। हालिया स्थिति यह है कि इनकी संख्या 58 से भी अधिक हो चुुकी है। एक दल के बजाए अब ये टुकड़ियों में विचरण कर रहे हैं। अलग-अलग दलों में बंटे हाथियों की गिरानी करने के लिए पर्याप्त अमला नहीं हैं। देर रात जंगल के भीतर घुस जाने से इनपर निगरानी नहीं होती। ऐसे में ग्रामीणों को समय में हाथी के आने की जानकारी नहीं मिलती और खदेड़ने से पहले वे नुकसान पहुंचाने में सफल होते हैं।

कारगर नहीं है उपाय

वन विभाग की ओर से मानव हाथी द्वंद को रोकने कई तरह की उपाय अपनाई जा रही, लेकिन उनकी बढ़ती संख्या के कारण असफल साबित हो रही। सौर फेंसिंग, कालर आइडी, हूटर जैसे तकनी साधनों का उपयोग हाथियों को जंगल से गांव की ओर आने में नहीं रोक पाए। मधुमक्खी पालन से हाथियों को भगाने की योजना को दो साल बाद भी अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका है। वन विभाग ने इसके लिए हाथी प्रभावित गांव के करीब छह सौ ग्रामीणों को लाखों रुपये खर्च कर प्रशिक्षण भी दिया। इसका उद्देश्य शहद उत्पादन के साथ हाथियों के हमले के घटनाओं को रोकने की योजना थी। इसके अलावा पश्चिम बंगाल के हुल्लड़ पार्टी और दक्षिण भारत से लाए हाथी दल भी मानव-हाथी द्वंद को समाप्त नहीं कर पाए।

Posted By: Nai Dunia News Network

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