कोरबा (नईदुनिया प्रतिनिधि)। नरवा गरूवा घुरूवा बारी शासन की महत्वकांक्षी योजना है। इसके बाद भी मवेशियो के संरक्षण के लिए अभी तक जिले के 130 पंचायतों में गोठान नहीं बना है। इस वजह से धुमंतू मवेशी अभी भी सुरक्षित नहीं हैं। खेती का दौर फिर से शुरू हो चुका है। ऐसे में प्रशासन ने एक बार फिर से रोका छेका के लिए गाइड लाइन जारी कर दी है। ग्रामीण क्षेत्रों में चरागन भूमि के साथ चरवाहा सुनिश्चित नहीं होने स मवेशियों को शहर की ओर आने से रोकना चुनौती बनी है।

मवेशियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए शासन ने रोका-छेका कार्य योजना शुरू की है। जिसका उद्देश्य यहां-वहां भटकते मवेशियों को गोठान पहुंचाना है। विडंबना यह कि जिन गांव में गोठान बन चुका है वहां अधिकांश में अभी तक चरवाहों की नियुक्ति नहीं की गई है। ऐसे में मवेशियों का संरक्षण नही हो रहा। खेती किसानी का काम शुरू हो चुका है। खेतों में बोआई शुरू होने से मवेशियों को शहर की ओर हांके जा रहे। इधर शहर में भी में रोका छेका अभियान बंद होने से सड़कों में मवेशियों का जमावड़ा बढ़ गया है।

बताना होगा कि ग्रामीण क्षेत्रों मे चारागन भूमि अतिक्रमण के कारण लगातार सिमट रहा है। ऐसे में घुमंतू गाय बैल के लिए चारा की कमी है। शासन की ओर से नरवा गरूवा घुरूवा बारी योजना के तहत गायों के संरक्षण के लिए गोठान की योजना तो शुरू की गई है लेकिन अभी तक कई गांव में इसका निर्माण पूरा नहीं हुआ है। झगरहा, सोनपुरी, बुंदेली, नकटीखार आदि आसपास ग्रामीण क्षेत्र के मवेशियों का जमावड़ा अब शहर में होने लगा है। ज्यादातर शहर के साप्ताहिक बाजारों में पशुओं देखा जा सकता है। शहर के कांजीहाउस की दशा बदहाल हो चुकी है, निगम प्रशासन को भी यहां मवेशियों को रखने में रूचि नहीं है।

यहीं वजह है कि शहर में घुमंतू पशुओं की संख्या बढ़ती ही जा रही है। शहर के मवेशी पालक इन्हें सड़कों पर ही छोड़ देते हैं। शहर में कई स्थानों पर सड़क किनारे खाली जमीन में तबेला बनाकर मवेशी पालन किया जा रहा है। इस तरह का नजारा कोरबा बालको मार्ग के अलावा जमनीपाली में देखा जा सकता है। पालक दुधारू गायों को ही संरक्षण देते हैं। रात या दोपहर होने पर सड़क के बीचों बीच बैठ जाते है। जिससे आवागमन करने वाले यात्रियों को मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। सड़कों के अलावा आम बाजार में भी पशुओं के बेखौफ घूमने से भीड़ में समस्या बनी रहती है।

नेशनल हाइवे में फिर से जमावड़ा

गोठान बनने के बाद भी मुख्य मार्गों में मवेशियों को रात के समय सड़क के बीचो बीच बैठे देखा जा सकता है। बीते वर्ष कटघोरा अंबिकापुर मार्ग में भारी वाहनों की चपेट में आकर 15 से भी अधिक मवेशियों की मौत हो गई थी। घटना की पुनरावृत्ति न हो इस आशय से तात्कालिक एसडीएम पंचायत सचिवों ने मवेशियों का सड़क से खदेड़ने की जिम्मेदारी दी थी। नियम का पालन नहीं होने के एक बार फिर से नेशनल हाइवे में मवेशियों का जमावड़ा शुरू हो गया।

खरीफ के लिए पर्याप्त नहीं वर्मी कंपोस्ट

शासन की ओर से वर्मी कंपोस्ट को बढ़ावा देने के किसानों को प्रेरित किया जा रहा। जिन पंचायतों में गोठान की सुविधा नहीं है वहां गोबर खाद तैयार नहीं हो रहा। ऐसे में किसान रासायनिक खाद पर ही निर्भर है। जिले में अकेले धान खेती का रकबा 98 हजार हेक्टेयर है। जिसके लिए आठ लाख क्विंटल वर्मी खाद की जरूरत है। संचालित गोठानों से केवल दो लाख क्विंटल ही खाद उपलब्ध होती है। धान के अलावा दलहन, तिलहन व सब्जी फसल में अधिकांश किसान अब भी रासायनिक खाद का उपयोग करते हैं।

रोका-छेका अभियान का उद्देश्य मवेशियों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाना है। इससे किसानें की फसल को भी नुकसान नहीं होगा। गोठानों में चरवाहों की नियुक्ति की गई है। जहां अभी गोठान तैयार नहीं हुआ है वहां भी पंचायत स्तर पर नियुक्त करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।

नूतन कुमार सिंह, मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला पंचायत

Posted By: Nai Dunia News Network

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