कोरबा, नईदुनिया प्रतिनिधि। समाज की बेड़ियों को तोड़कर एक नाबालिग ने कुछ साल पहले अपनी पंसद के वर के साथ प्रेम विवाह किया था। उनके प्रेम की निशानी के रूप में पहले एक बेटी, फिर एक बेटा हुआ। जिन्होंने जिंदगी भर साथ जीने-मरने की कसमें खाईं, पांच साल में ही उनका अटूट प्यार उड़न छू हो गया और पति ने उन्हें छोड़ दिया। इन मासूमों ने अभी रिश्तों को जानना शुरू ही किया था कि दुनिया में सबसे प्यारी उनकी मां उन्हें इस दुनिया में बेसहारा छोड़ कर एक नए प्रेमी के साथ गायब हो गई। माता-पिता के होते अनाथ की तरह दोनों बच्चे शाम को मुक्तिधाम के बाहर दुबके बैठे मिले।

मोतीसागरपारा में रहने वाली एक नाबालिग ने अपनी पसंद से प्रेम विवाह किया था। कुछ वक्त पति-पत्नी खुशहाल जीवन जीते रहे और उनके घर पहले एक बेटी आई और उसके बाद एक प्यारा से बेटा। घर-परिवार के संघर्ष ने शायद उनकी प्रेम प्रतिज्ञा को चकनाचूर कर दिया था, जिसकी वजह से उनके बीच कड़वाहट भर गई। आखिरकार पति ने दोनों बच्चे व पत्नी को छोड़ दिया। बताया जा रहा कि उसने भी अपने लिए एक नई जीवनसंगिनी ढूंढ़ ली थी। उनकी बेटी अभी चार साल की है और बेटा महज तीन साल का। ये बच्चे अभी घर-परिवार और रिश्तों के बंधन को जानना-पहचानना सीख ही रहे थे कि जिंदगी ने उन्हें संघर्ष की एक नई पाठशाला में दाखिला दे दिया। दुनिया में उनकी एकमात्र सरपरस्त रही मां उन्हें अकेला छोड़कर किसी और के साथ नई जिंदगी शुरू करने चली गई। इतनी सी उम्र में इन बच्चों के साथ हुई इतनी बड़ी नाइंसाफी ने एक बार फिर मानवता के सारे मापदंड को कटघरे पर खड़ा होने मजबूर कर दिया है।

नाना-नानी को मिले मां का इंतजार करते

एक दुखद पहलू यह भी कि मोतीसागरपारा के जिस मुक्तिधाम में आकर हम सब की जीवन यात्रा खत्म होती है, दुर्भाग्यवश उसी के बाहर इन मासूमों की जद्दोजहद से भरी एक नई जिंदगी शुरू हुई। देर शाम दोनों भाई-बहन मुक्तिधाम के बाहर बैठे अपनी मां का इंतजार कर रहे थे। किसी से जानकारी मिलने पर उनके नाना-नानी वहां पहुंचे और एक जगह पर दुबके बच्चों को अपने साथ घर ले गए। इतनी सी उम्र में ऐसे संघर्ष भरे जीवन की ओर उन्हें धकेलने का जिम्मेदार आखिर कौन है, यह जवाब शायद किसी के पास नहीं।

विजातीय समुदाय में ब्याह रचाने की सजा

अभी इन बच्चों का संघर्ष यहीं न थमा और माता-पिता के विजातीय समुदाय में ब्याह रचाने की सजा भी उन्हें ही भुगतने मजबूर होना पड़ा। बताया जा रहा कि सामाज की जंजीरों में जकड़े रहने विवश नाना-नानी ने भी उन्हें अपने से दूर कर दिया है। उनका कहना था कि बच्चों को वे अपने पास नहीं रख सकते और इसीलिए उन्होंने चाइल्ड लाइन से संपर्क किया। दोनों मासूम अपने भविष्य से भले ही अंजान हो, पर माता-पिता का प्यार और साथ छूटने की पीड़ा उन्हें एक दुखद एहसास से गुजरने मजबूर तो करता होगा।

सीडब्ल्यूसी ने किया मातृछाया के सुपुर्द

जिला बाल संरक्षण अधिकारी दयादास महंत ने बताया कि बच्चों की देखरेख एवं संरक्षण के लिए नाना-नानी ने चाइल्ड लाइन से संपर्क किया था। चाइल्ड लाइन के माध्यम से उन्हें बाल कल्याण समिति के समक्ष पेश किया गया, जहां से उन्हें महिला एवं बाल विकास विभाग की ओर से संचालित विशेषीकृत दत्तक ग्रहण अभिकरण, सेवाभारती मातृछाया में भेज दिया गया है। महंत ने बताया कि सीडब्ल्यूसी की ओर से पिता से काउंसलिंग के जरिए यह जानकारी ली जाएगी कि आगे वे बच्चों को अपनाएगा या नहीं? जवाब के आधार पर नियमानुसार बच्चों का भविष्य निर्धारित किया जा सकेगा।

Posted By: Nai Dunia News Network