कोरबा Korba Lockdown Update । सिर पर भारी बोझ लिए पति के पीछे-पीछे तपती-धधकती दोपहरी में झुलसते हुए वो चली जा रही थी। न किसी से मदद की उम्मीद, न चेहरे पर थकान, नजर आई तो मन के भीतर से झलकती सिर्फ एक अभिलाषा, अपने लल्ला को लेकर गांव पहुंच जाऊं तो चैन की सांस मिले। पसीने से तरबतर मां और मजदूरन ने एक हाथ में सीने से लगाए बिटिया को थाम रखा था, तो दूसरे में पैदल चलते मासूम की उंगली पकड़ रखी थी। लंबे सफर में लंबी डगर पर यूं आगे बढ़ रही थी, जैसे वह कहती जा रही हो कि बेटे बस थोड़ी दूर और! इस राह पर वे अकेली नहीं, हर दूसरी घड़ी ये नजारा उस सड़क पर देखा जा रहा है, जो उसे बनाने वाले मजदूरों के पांव के लिए छालों का कारण बन गए।

एक के बाद एक नन्हें-मुन्ने बच्चों और भारी सामान के साथ कदम ताल करते मजदूर परिवारों के गुजरने का यह दृश्य रविवार की दोपहर अंबिकापुर-बिलासपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर पाली का है। कांवर में सामान, कंधों पर बच्चे और सिर पर बोझा उठाए ये मजदूर न जाने कब से चले जा रहे थे। बच्चे-बड़े मिलाकर मुुंगेली जिले के 25 प्रवासी मजदूरों का यह दल उत्तर प्रदेश के बनारस से लौट रहा था।

रोजी-मजदूरी कर गांव लौटने की तैयारी के बीच वे लॉकडाउन में फंस गए। इन परिवारों ने काफी मशक्कत के बाद यहां तक का सफर पूरा किया था, पर उनकी यात्रा अभी बाकी थी। इसलिए वे रुके नहीं, चलते रहे। चलते-चलते ही कुछ बातों के साथ उन्होंने अपने इस कठिन सफर का दर्द साझा करते हुए कहा कि हम तो मेहनत-मशक्कत करने वाले लोग हैं। न तो चलने से डर लगता है और न ही थकान से। पसीना बहाने की आदत ही थी, जो एक-एक कदम और दिन निकालकर इतनी दूर से यहां तक लौट पाए।

बनारस से किसी तरह पैदल चले तो एक जगह ट्रक वाले भैया ने बैठाया। रातभर सफर किया और उसके बाद यहां पहुंचे और उतरकर फिर से पैदल की राह पकड़ ली। बस ऐसे ही कहीं पैदल तो कहीं किसी की दया के सहारे 400 किलोमीटर दूर से यहां तक पहुंच पाए हैं। पाली में कुछ दूर चलने के बाद उन्हें एक ट्रक में लिफ्ट मिली और वे बिलासपुर की ओर निकल गए।

सफर की मुश्किल से बड़ी है घर पहुंचने की खुशी

मजदूरों ने कहा कि भले ही लंबा सफर और अनगिनत मुश्किलों को लांघकर हम सब यहां तक पहुंच सके, पर खुशी सिर्फ ये है कि अब हमारा गांव ज्यादा दूर नहीं और हम आज रात तक घर में होंगे। छत्तीसगढ़ की सीमा में प्रवेश करते ही जो खुशी हमें हुई वह पिछली सारी मुश्किल से बड़ी है। दुख सिर्फ इस बात का है कि हम चाहे छत्तीसगढ़ में हों या उत्तर प्रदेश में, मदद के लिए बराबरी का भाव होना था, जो कम ही मिला। दीगर राज्य या शहर का होने की बात कहकर समुचित मदद नहीं मिल सकी, जिससे बड़ी संख्या में मजदूर परिवार परेशान हो रहे हैं। ये वक्त तो हर किसी का हाथ थामने का है, जो नहीं हो रहा।

नाम से क्या करोगे भैया, ये पूछो कैसे गुजरे रास्ते

हमारे पाली प्रतिनिधि के नाम पूछने पर उन्होंने कहा कि नाम-पता जानकर क्या करोगे भैया, पूछना है तो ये पूछो कि ये दिन और रास्ता कैसे गुजरा। मीलों चलकर भी हमें इतनी थकान नहीं हुई, जितना डर बनारस के उस कमरे में बैठे-बैठे ये सोच के लग रहा था कि कुछ दिन बाद भूख हमें खत्म करने तैयार बैठी है। एक-एक कर दिन गुजर रहे थे, रही-सही जमा-पूंजी भी खत्म हो रही थी। रोजी से पेट पालने वालों के लिए ये दिन बहुत कीमती थे, जो बिना कमाए ही लॉकडाउन में निकल गए। परदेस में फंस गए और अब ये फिक्र हो रही थी कि अपने छोटे-छोटे बच्चों को भूख से कैसे बचाएं। ईश्वर का नाम ले किसी तरह निकल गए।

इस वक्त ये सड़क ही श्रमिक का सच्चा साथी

लॉकडाउन में यात्री बस, ट्रेन व अन्य सभी लोकसेवा यान बंद हैं और प्रवासी मजदूरों के सिर्फ एक श्रमिक ट्रेन बिलासपुर से दिल्ली के बीच चलाई जा रही। कई टैक्सी या चार पहिया वाहनों को अपने खर्च पर बुक कर घर जाने के लिए यात्रा पास जारी किया जा रहा। पर टैक्सी का महंगा किराया उठाने की बात इन मजदूरों के बूते से बाहर है। यही वजह है जो ये मजदूर अपने सामान सिर पर तो अपने बच्चों को कंधे पर उठाकर गांव जाने निकल पड़े हैं। देखा जाए तो इस समय घर पहुंचने की लंबी दौड़ में उनके लिए वह सड़क ही सबसे सच्चा साथी है, जिसका दिन-रात पसीना बहाकर निर्माण उन्हीं श्रमिकों ने किया था।

Posted By: Nai Dunia News Network

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