कोरबा । हमारे कोयला खदान क्षेत्र ही नहीं, उनके आस-पास की कालोनियां भी हवा में सांस लेने लायक शुद्धता के पैमानों से कोसों दूर हैं। इसके बाद भी कर्मचारी अपने कमजोर फेफड़ों से खदानों में उत्पादन की कमान बिना रुके लगातार संभाल रहे हैं। पहले से ही डेंजर जोन की मुश्किल परिस्थितियों में देश को ऊर्जावान बनाने दिन-रात जुटे कोयला कामगार महामारी की भयावहता भी महसूस कर रहें हैं। अब तक प्राप्त आंकड़े के अनुसार केवल एसईसीएल के ही 949 कर्मी संक्रमित हुए तो 107 कोरोना वायरस की चपेट में आकर अपनी जान गंवा चुके हैं।

वातावरण में मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक तत्वों के उत्सर्जन को नियंत्रित करने की दिशा में उचित कदम उठाए जाने की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है। वर्तमान कोरोनाकाल में एसईसीएल में कार्यरत 949 कर्मी संक्रमित हुए, जबकि 107 कोयला कर्मियों की मौत कोरोना की चपेट में आने से हो चुकी है, जबकि बड़ी संख्या में कर्मचारी व उनके परिवार संक्रमण से जूझ रहे या ठीक होकर वापसी भी कर चुके हैं। सांस में घुलते कोयले कणों के कारण कोयलाकर्मी एक अरसे से श्वसन संबंधी बीमारियों से जूझ रहे हैं। अत्यधिक प्रदूषण के चलते कोरबा में औद्योगिक क्षेत्र की करीब 12 प्रतिशत आबादी दमा और ब्रोंकाइटिस से ग्रस्त है। कोरबा में बीते वर्ष की एक रिपोर्ट में इन दोनों बीमारियों का प्रतिशत 5.46 दर्ज किया गया है। कोयले की खुली खदानों और कोयले के ईंधन से चलने वाले संयंत्रों के कारण कोरबा अत्यधिक प्रदूषित है।

कोयला आधारित संयंत्रों के पास भी डेंजर जोन

पिछले साल जिले के एसईसीएल खदान क्षेत्र, इससे लगी कालोनियों-बस्तियों, कोयला आधारित अन्य विद्युत संयंत्रों व औद्योगिक संस्थानों के दायरे में किए गए क्रास-सेक्शनल अध्ययन में गंभीर जानकारी सामने आई थी। राज्य स्वास्थ्य संसाधन केंद्र ने अप्रैल 2020 की अपनी एक रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख था कि करीब 11 किलोमीटर के दायरे में कोरबा के शहरी औद्योगिक क्षेत्र में रहने वाली आबादी का 12 प्रतिशत हिस्सा अस्थमा व ब्रोंकाइटिस से जूझ रहा है।

आक्सीजन की जरूरत अनुरूप कार्यक्षमता कम

कोयला आधारित पावर प्लांटों के आसपास लोगों से लिए गए नमूनों के बाद यह बात सामने आई है कि यहां के लोगों में सामान्य आबादी के मुकाबले होने वाली श्वांस की बीमारी कई गुना अधिक है। वायु प्रदूषण के चलते शरीर को आक्सीजन की जरूरत अनुरूप फेफड़ों की कार्य क्षमता कम है। निष्कर्ष में दमा के लक्षणों व ब्रोंकाइटिस जैसी श्वसन संबंधी रोगों में काफी वृद्धि देखी गई। प्लांट के पास रहने वाले समूह के बीच अस्थमा में 11.79 फीसदी व ब्रोंकाइटिस में 2.96 फीसदी वृद्धि दर्ज हुई।

विश्व की दूसरी बड़ी खदान, रोग प्रतिरोधकता पर असर

विश्व की दूसरी सबसे बड़ी कोयला खदान कोरबा के गेवरा में है। क्षेत्र में दस संयंत्र से छह हजार मेगावाट बिजली का उत्पादन हो रहा। इनसे निकलने वाले फ्लाई ऐश से भी लोग प्रभावित हैं। पानी, वनस्पति व जन्य जीवों पर भी असर पड़ रहा। खदान क्षेत्र में उड़ने वाली कोल डस्ट फेफड़ों पर सीधे असर से क्षमता घटी। इससे लोग पूरी क्षमता से सांस लेकर शरीर के संचालन के लिए आक्सीजन की जरूरी मात्रा नहीं ले पा रहे और इस तरह उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी घट गई है।

Posted By: Nai Dunia News Network

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