Mothers Day 2020 : विकास पांडेय, कोरबा (नईदुनिया)। जिंदगी के रंगमंच पर ऊपर वाले ने मां का किरदार ही कुछ ऐसा रचा है, जिसके आंचल के आश्रय में आकर मुश्किलों की तपती धूप भी शीतल छांव में बदल जाती है। लॉकडाउन में अपने घर-परिवार से सैकड़ों मील दूर कोटा के एक हॉस्टल में फंसी छात्राओं के लिए सुनीता के स्नेह की छांव ने भी वही शीतलता दी, जिसकी उन्हें उस वक्त सबसे ज्यादा जरूरत थी। वहां रहकर पढ़ाई कर रही अपनी बेटी के लिए वे फरवरी से वहां रह रहीं थीं। जब कोरोना महामारी का संकट गहराया, तो इकलौती गार्जियन के रूप में वहां मौजूद सुनीता को हॉस्टल की 90 छात्राओं ने अपनी मां मान लिया।

कोरबा जिले के अमरैयापारा में निवासरत श्यामसुंदर तिवारी शासकीय ईवीपीजी कॉलेज में भौतिकशास्त्र के सहायक प्राध्यापक हैं। वे अपनी धर्मपत्नी सुनीता, दो बधाों अर्चना व आयुष, भाइयों व माता-पिता के साथ संयुक्त परिवार के साथ रहते हैं। हर मां की तरह सुनीता का भी अपनी बेटी अर्चना और बेटे आयुष के लिए यही सपना है कि वे जिंदगी में एक अच्छा मुकाम हासिल करें। मेडिकल में करियर बनाने का लक्ष्य लेकर चल रही बेटी अर्चना राजस्थान के कोटा स्थित कोचिंग एकेडमी में नीट की तैयारी कर रही है। घर-परिवार से कभी दूर रहने की नौबत नहीं आई। अकेले रहने में झिझक से माता-पिता को फिक्र भी हुई। तय किया गया कि परीक्षाओं के वक्त ही वहां जाकर हॉस्टल में रहेगी और इस दौरान अर्चना की मां सुनीता उसके साथ रहेगी। फरवरी में अर्चना व उनकी मां सुनीता कोटा गए, जहां वे लैंडमार्क सिटी कुन्हारी एलएन सम्यक के एक गर्ल्स हॉस्टल में रहने लगे। बेटी तैयारी में जुटी रहती और मां सुनीता उसका हौसला बढ़ाती देखभाल में जुटी रहतीं।

इस बीच हॉस्टल में रहने वाली 90 छात्राएं सुनीता से ऐसे घुल-मिल गई कि जैसे उनकी अपनी मां उनके साथ रहकर आत्मविश्वास बढ़ा रहीं हों। जब लॉकडाउन लागू हो गया, तो किसी का भी हॉस्टल से बाहर निकलना बंद हो गया। ऐसे मुश्किल वक्त में सुनीता न केवल अर्चना, बल्कि घर-परिवार से इतनी दूर रह रहे वहां की 90 छात्राओं की मां बन गईं। वे उनसे बातें करतीं, उनका आत्मविश्वास बढ़ातीं रहतीं और किसी भी स्थिति में हताशा-निराशा न फटकने देने की कोशिशों में जुटी रहतीं। उन्होंने उनका साथ तब निभाया, जब उन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी। पिछले दिनों छत्तीसगढ़ से कोटा गई बस में सुनीता अपनी बेटी अर्चना के साथ कोरबा लौटीं।

परदेस में हमें तो हमारी अम्मीजान मिल गईं

कोटा के उस हॉस्टल में देश-विदेश से आई 90 छात्राओं में किसी के भी पालक या माता-पिता वहां नहीं थे। पूरे हॉस्टल में सुनीता ही एकमात्र थीं, जो अर्चना के साथ वहां रह रहीं थीं। सुबह से अर्चना की देखभाल के साथ वे हॉस्टल के अन्य बालिकाओं का भी ख्याल रखा करतीं। लंच, डिनर व जरूरत की अन्य चीजों के लिए न केवल अर्चना की, बल्कि हॉस्टल में हर किसी की फिक्र किया करतीं। इनमें दुबई की दो बालिकाएं शाइना व इनाफ खान भी रह रहे थे। उनका कहना था कि परदेस में जैसे उन्हें उनकी अम्मीजान मिल गई हों, जो हर वक्त उनका ख्याल रखने उनके पास मौजूद रहतीं।

गाने गाकर रिफ्रेशमेंट, बेटियों की बेस्ट फ्रेंड

एमए समाजशास्त्र की डिग्री प्राप्त कर चुकीं सुनीता को गाने का काफी शौक है। उनकी बेटी अर्चना ने बताया कि चाहे घर हो या कोटा का हॉस्टल, वे उसे एक पल के लिए भी अकेला महसूस करने का मौका नहीं देतीं। हर वक्त वे उसकी सेहत, डाइट और तैयारी के लिए मदद में व्यस्त रहतीं। सुबह छह बजे उठ कर नाश्ता लेने चलीं जाती और इस तरह उनकी दौड़ शुरू हो जाती। पढ़ते-पढ़ते मन बोझिल होता, तो उनकी पसंद के गाने गाकर तरोताजा कर देतीं। उनके गाने सुनने के लिए हॉस्टल की अन्य छात्राएं भी एक पैर पर खड़ी रहतीं। सुनीता के रूप में एक मां के साथ सहेली पाकर सभी उत्साहित रहते।

Posted By: Nai Dunia News Network

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