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कोरबा (नईदुनिया प्रतिनिधि)। जीवन में पहली बार जीवकोपार्जन के लिए दीगर राज्य गया था। ओडिशा के सुंदरगढ़ नाला निर्माण के कार्य में आठ ही दिन काम कर पाया था। लॉकडाउन के कारण काम बंद हो गया। आठ दिन की पलायन के लिए 80 किमी पैदल चलकर गांव वापस आना पड़ा। अब पिᆬर कभी दूसरे राज्य में काम के लिए नहीं जााऊंगा, गांव के ही रोजगार गारंटी में काम करूंगा।

यह कहना है पाली निवास अकबर का। वह ओडिशा के सुंदरगढ़ दरलीपाली के राखड़ डेम में चल रहे नाला निर्माण में काम करने गया था। अकबर का कहना है कि वह पहली बार यह सपना संजोकर गया था कि अनुभव किया जाना चाहिए कि बाहर में काम करने का अनुभव कैसा होता है। उसने बताया कि दरलीपाली जाने के लिए वह घर 12 मार्च को घर निकला था। कार्यस्थल पर पहुंच कर आठ ही दिन काम कर पाया। 22 मार्च को लॉकडाउन के बाद काम बंद हो गया। कार्य स्थल में महीने भर रहा। खाने की समस्या के कारण घर लौटने पर विवश होना पड़ा। अकबर का कहना है उसके लिए जीवन का सबसे बेकार क्षण रहा। वर्तमान में वह पाली के क्वारंटाइन सेंटर में रहकर वापस गांव जाने के लिए दिन गिन रहा है। कथरीमाल रह क्वारंटाइन का समय गुजार रहे शनिराम कंवर का कहना है कि सेंटर में अब भी अव्यवस्था का आलम है। मजदूरों को सबसे कठिन समस्या शौचालय और स्नान के लिए पानी की है। कुदुरमाल में पॉजिटिव मरीज पाए जाने के कारण समय 14 दिन से अधिक समय तक मजदूरों को रोका जा रहा है।

गांव के रोजगार गारंटी में करेंगे काम

अकबर का कहना है अब पलायन से तौबा करते हैं। जीवन के पहली ही बाहरी सपᆬर ने दीगर राज्य जाकर कमाई करने के मामले में खटास भर दिया। अब बस एक ही इच्छा है किसी तरह क्वारंटाइन के दिन खत्म हो जाए। गांव के रोजगार गारंटी में ही काम करूंगा। गांव की कम कमाई शहर की अधिक कमाई से बेहतर है। सरकार से यही इल्तजा है कि भुगतान रोजगार गारंटी में जल्दी करा दे, जिससे किसी मजदूर को बाहर जाना न पड़े।

हार्ड वर्क करना नहीं आता

कुदुरमाल क्वारंटाइन सेंटर में ठहरे मयाराम उरांव का कहना है वह मध्यप्रदेश में कपड़े से जुड़े मिल में ऑनलाइन सप्लाई काम करता था। मजदूरों के पलायन के कारण पᆬैक्ट्री बंद हो गई। उसे हार्ड वर्क नहीं आता। ऐसे में रोजगार गारंटी में काम पर जाना उसके लिए संभव नहीं। पहले क्वारंटाइन सेंटर से निकल जाएं। गांव में ही कोई बिजनेस की तलाश करेंगे।

खेती किसानी का आसरा

शहर की जिंदगी से हट कर अब ग्रामीण परिवेश में जीवन बसर करनी होगी। गांव में खेती किसानी का ही भरोसा है। यह कहना है। नीलांबर कंवर का। वे इन दिन कथरीमाल क्वारंटाइन सेंटर में घर वापसी के लिए समय बिता रहे हैं। नीलांबर बताते हैं कि वह पिछले छह माह से महाराष्ट्र के रायगढ़ जिला में चल रहे कंट्रक्शन कार्य में बतौर मजदूर कार्यरत था। अपने गांव लौटने की खुशी है।

अपना गांव आखिर होता है अपना

जीवकोपार्जन के लिए बाहर जाकर स्वयं को व्यवस्थित कर पाना बहुत मुश्किल है। बड़े शहरों में रोजगार की सुविधा तो है लेकिन वहां रहने की सुविधा दयनीय है। यह कहना है दरशलाल रात्रे का। वह भोपाल में विद्युत का काम करने वाली कंपनी में पᆬीटर का काम करते थे। रात्रे का कहना है कि अब रोजगार के लिए बाहर नहीं जाएंगे। आखिर अपना गांव अपना ही है। यहीं जीवकोपार्जन के साधन ढूंढ़ेंगे।

Posted By: Nai Dunia News Network

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