पाली/ कोरबा, नईदुनिया न्यूज। डीएमएफ से विकसित करने तीन साल पहले चुना गया नानबांका आज भी उस परिकल्पना से दूर है, जिसके तहत न्यास का गठन किया गया था। पेश हुई ताजा नजीर एक बार फिर खनिज न्यास की डकार से जुड़ती दिख रही, जिसकी राशि खर्च कर गांव में एक आलीशान लाइब्रेरी का निर्माण किया गया, जिसका आज तक लोकार्पण ही नहीं हुआ।

जिस भवन को बनाने लाइब्रेरी के नाम पर 20 लाख खर्च किए, वहां बैठने के लिए कुर्सी तो दूर पढ़ने के लिए एक किताब तक नहीं है। आलम यह कि एक साल से भवन ताले में बंद है। यानी यह कहना गलत न होगा कि एक बार फिर शासन की महत्वाकांक्षी योजना ठेकेदारी की निरंकुश राजनीति की भेंट चढ़ गई। ग्रामीण तो दूर सरपंच को भी नहीं पता कि उनके गांव में इतनी राशि आखिर क्यों खर्च की जा रही।

राष्ट्रीय राजमार्ग से लगा पाली विकासखंड का गांव नानबांका जिला मुख्यालय से 55 किलोमीटर दूर स्थित है। गांव में प्रवेश करते ही गली में बहता गंदा पानी स्वागत करता है। मोहल्ले में रास्ता चौड़ा कर व्यवस्थित करने की कवायद आज भी अधूरी है, जो आज भी वैसे ही उबड़-खाबड़ है। वहां बारिश में इतना कीचड़ भर जाता है कि गाड़ी या साइकिल तो दूर पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है।

गांव में जिला खनिज न्यास की राशि का जमकर दुरुपयोग किया गया, जो 20 लाख रुपये की लागत खर्च कर बनाए गए लाइब्रेरी भवन को देखकर पता चलता है। इस भवन का निर्माण तो कर दिया गया, लेकिन अध्ययन-अध्यापन का उद्देश्य हवा-हवाई साबित हुआ।

उपयोगहीन भवन में न तो बैठने के लिए कुर्सी है और न ही टेबल या अन्य फर्नीचर। हैरत की बात तो यह है कि अध्ययन की आदत विकसित करने की मंशा से बनी लाइब्रेरी में बैठकर पढ़ाई करने शासन-प्रशासन ने किताबें तक देने की जहमत महसूस नहीं की। परिणामस्वरूप बिना पुस्तक वाली यह लाइब्रेरी पिछले एक साल से ताले में बंद पड़ी है।

नहीं आती बस फिर भी बनाया स्टॉप

गांव में बस या कोई अन्य सवारी वाहन नहीं चलते, फिर भी बिना जरूरत तीन लाख खर्च कर एक बस स्टॉप का निर्माण कर दिया गया। बजाय इसके गांव की कच्ची सड़क को दुरूस्त करने, आज भी गांव के रास्ते कीचड़ से सराबोर दिखाई देते हैं। नानबांका को जब विकसित करने चुना गया, पक्की सड़क, बिजली व गांव के लोगों के लिए पार्क समेत अनेक योजनाओं का सब्जबाग दिखाया गया था। सारे सरकारी दावे हवा-हवाई साबित हुई। स्थिति यह है कि गांव को बेहतर रूप देना तो दूर लोगों को यह भरोसा भी नहीं दिलाया जा सका कि उनका गांव विकसित होने की राह पर है। शासन-प्रशासन के तमाम दावे कागजी व गांव को बेहतर बनाने लाई गई योजनाएं आज भी कागजों में ही कैद है।

एनएच से चार किमी दूर, दो किमी कच्चा

हर वार्ड में सीसी रोड का लक्ष्य अधूरा है, जिससे गलियों में कीचड़ भरा रहता है। विकसित गांव की बात हो तो जेहन में वह दृश्य उभरता है, जहां हर आदमी के लिए घर, सड़क, बिजली, रोजगार, अच्छी सेहत व पीने को शुद्ध पानी के माकूल इंतजाम हों।

जिला प्रशासन दावे करता रहा कि इस सपने को साकार करने पूरी ताकत झोंक दी गई है, पर नानबांका को पूरे प्रदेश के लिए उदाहरण के रूप में पेश करने का दावा वास्तविकता से आज भी कोसों दूर और हालात आज भी वही है। लोग जिंदगी की जद्दोजहद में छोटी-छोटी जरूरत व समस्याओं के लिए हर रोज संघर्ष कर रहे। नानबांका का पहुंचमार्ग भी अधूरा है। एनएच से बड़े बांका तक पीएमजीएसवाई सड़क बनी पर दो किलोमीटर गांव तक पहुंचमार्ग कच्चा है।

फैक्ट फाइल

0 ग्राम पंचायत- नानबांका

0 कुल वार्ड- नौ

0 जनसंख्या-1600

0 जिला मुख्यालय से दूरी- 55 किमी

0 एनएच से दूरी- चार किमी

0 पहुंचमार्ग की स्थति- दो किमी पक्का, दो किमी कच्चा

0 योजना- डीएमएफ से विकसित करना

0 आंगनबाड़ी भवन- 6.45 लाख

0 लाइब्रेरी भवन- 20 लाख

0 प्राथमिक शाला भवन- 10.85 लाख

0 बाजार शेड- 40 लाख

0 दो पुलिया- 6.80 लाख

क्या कहते हैं ग्रामीण

किए गए निर्माण कार्य उपयोगहीन

फागूराम का कहना है कि ग्राम विकास के नाम पर जो धांधली की जा रही, उस पर तत्काल रोक लगाया जाना चाहिए। ग्रामीण आज भी सड़क-पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। उपयोगहीन कार्यों की बजाय पानी, सड़क, बिजली या तालाब पर खर्च करने की जरूरत आज भी महसूस की जा रही।

कीचड़ में संघर्ष करते हैं छात्र-छात्राएं

चोलाराम ने बताया कि गांव को नवीन पंचायत का दर्जा मिले पांच साल गुजर गए, पर अब तक न सीसी सड़क बन सकी। बारिश में अब भी गांव के लोगों व स्कूल के छात्र-छात्राओं को कीचड़ से जद्दोजहद करनी पड़ रही। गांव में बस नहीं चलती, फिर भी मनमानी करते हुए बस स्टॉप बना दिया गया।

फ्लोराइडयुक्त पानी पीने हैं मजबूर

सावित्री ने कहा कि हैंडपंप से फ्लोराइडयुक्त पानी को गांव के ग्रामीण पीने के काम में लाने के लिए मजबूर हो रहे हैं। दूषित जल पीकर कई लोग असमय बीमार व कमजोर हो रहे। शासन-प्रशासन को इस दिशा में गंभीरता दिखाते हुए गांव में कम से कम शुद्ध पेयजल जैसे जरूरी संसाधनों की उपलब्धता पर ध्यान देना चाहिए।

मूल समस्याओं से निजात की जरूरत

जगदीश प्रसाद ने कहा कि अध्ययन की आदत बनाना अच्छी बात है, लेकिन जब तक सड़क-पानी जैसी मुख्य समस्याओं से निजात नहीं मिलेगी, तब तक लोग किताबें पढ़ने में रुचि कैसे दिखाएं। बेहतर होता कि बिना पुस्तक की लाइब्रेरी भवन की बजाय वे 20 लाख रुपये पहले मूलभूत जरूरतों पर खर्च किए जाते।

डीएमएफ की राशि उन संसाधनों पर खर्च कर मनमानी की गई, जिनसे पहले मूलभूत जरूरतों को दुरुस्त कर गांव को विकसित करने की योजना बननी थी। 40 लाख का बाजार शेड हो, 20 लाख की लाइब्रेरी या तीन लाख का बस स्टॉप, गांव में इनकी जरूरत फिलहाल तो नहीं थी। बजाय इसके पानी, सड़क, बिजली या तालाब पर खर्च करने की जरूरत आज भी महसूस की जा रही। - संपति यादव, सदस्य, जनपद क्षेत्र क्रमांक-24 मदनपुर

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Posted By: Nai Dunia News Network