कोरबा (नईदुनिया प्रतिनिधि)। पिछले कुछ सालों से लाचार बेबस जमीन पर पड़े जीवन गुजार रहे दो बहनों की सुध अब जाकर प्रशासन ने ली है। पहुंच विहीन क्षेत्र सरइ बहार पहुंचकर दोनों बहनों को जिला अस्पताल में दाखिल कराया गया है। एक बहन की उम्र 15 व दूसरे की 18 है। बचपन में अस्वस्थ्य होने पर समुचित उपचार नहीं मिलने से उनका शारीरिक विकास रूक गया। अज्ञानता की वजह से उसके पिता जड़ी बूटी से इलाज करता रहा।

जिला मुख्यालय 46 किलो मीटर दूर ग्राम पंचायत लेमरूर के आश्रित ग्राम सरईबहार में पिछले सात सालों से असहाय जीवन बीता रहीं दो बहने सुखनी (18 वर्ष) और (सोनी 15 वर्ष) की जीवन में अब स्वास्थ्य लाभ मिलेने की आस बंध गई है। जिला प्रशासन ने दोनों बहनों को अस्पताल दाखिल कराया है। कोरबा एसडीएम हरिशंकर पैकरा का कहना है कि कोरवा ऐसी जनजाति हैं जो एक जगह स्थर नहीं रहते। जिला स्वास्थ्य विभाग की ओर से इलाज के लिए सतत शिविर लगाई जाती है। सूचना के अभाव में उनका सही समय पर इलाज नहीं हुआ। बच्चों के पिता टिकैत राम कोरवा का कहना है कि परिवार के सदस्य बीमार पड़ते हैं तो उन्हे जड़ी-बूटी खिलाया जाता है। स्वयं टिकैत राम भी पैर की गंभीर घाव से जूझ रहा है। उल्लेखनीय हैं सरइबहार अभी भी पहुंच विहीन है। लेमरू पहुंचने से पहले यहां जाने के लिए पगडंडी रास्ता है। गांव में 16 परिवार निवासरत है। इलाज समय रहते बालिकाओं का इलाज होता तो संभवतः उनकी यह दशा नहीं होती। कोरवाओं की बस्ती में अभी भी पेयजल की पर्याप्त सुवधिा नहीं है। गांव के लोग नाले की पानी से गुजारा करते हैं। मामले में एसडीएम हरिशंकर पैकरा का कहना है परिवारों को विकास की मुख्यधारा में जोड़ने के लिए हर संभव प्रयास किया जाएगा। उन्होने से बताया कि डाक्टरों की सलाह के अनुसार आवश्यकता पड़ी तो दोनों कोरवा बहनों को इलाज के लिए रायपुर भी भेजा जाएगा।

राशन के लिए जाते हैं 14 किलोमीटर दूर

छातासरई से लेमरू की दूरी 14 किलोमीटर है। यहां के रहवासी हर माह लंबी दूरी तय कर राशन के लिए पैदल जाते हैं। जिला प्रशासन का कहना है कि यहां रहने वाले सभी लोगों राशनकार्ड बनी है। इसके बाद भी लोग कंदमूल और जंगली आहार में निर्भर हैं। यह दशा केवल सरईडीह ही नहीं बल्कि अन्य गांव के परिवारों की भी है। परिवारों को नियमित राशन मिलता है या नहीं इसकी सतत अवलोकन कराने की जरूरत है।

साक्षरता दर में नहीं आई बढ़ोतरी

साक्षर भारत अभियान संचालन के आठ साल बीत जाने के बाद भी इन्हे शिक्षित नहीं किया जा सका है। लेमरू मार्ग में हरदीमौहा, सरईडीह सहित ऐसे कई गांव हैं, जहां के बच्चों की पढ़ाई लिखाई से दूर- दूर तक नाता नहीं हैं। स्कूल में दी जाने वाली सुविधाओं के बाद भी अशिक्षित बच्चों की संख्या में अब भी बढ़त नहीं हुई है। बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने की कवायद कोरवा बस्तियों में अभी भी कमजोर है।

छाता सरई में तैयार आवास खंडहर

जिला प्रशासन कोरवा परिवार को संयुक्त रूप जंगल क्षेत्र में बसाहट देने के लिए कोरवा कालोनी की कल्पना करते हुए ग्राम छाता सरई में आवास का निर्माण किया था। निर्माण के तीन साल बाद एक भी परिवार ने यहां रहने में रूचि नहीं दिखाई है। गुणवत्ताहीन निर्माण के कारण मकान का छत बारिश रिसता है। पीएम आवास की उपलब्ध कराने की पहल भी दयनीय है।

Posted By: Nai Dunia News Network

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