पेंड्रा/दानीकुंडी। नईदुनिया न्यूज

मरवाही के जंगल में भालू की बढ़ती जनसंख्या और घटते वनों की वजह से भालू चारा पानी की तलाश में मानव बस्ती की ओर आ जाते हैं। इससे भालू और इंसानों के आमने-सामने होने की घटना आम बात हो गई है। वहीं भालू के बचाव के लिए बनी कार्ययोजना अमल में नहीं लाने से भालू की स्थिति संकट में है। बीस वर्ष पूर्व शासन द्वारा स्वीकृत जामवंत योजना ठंडे बस्ते में चली गई है।

मरवाही क्षेत्र में भालू के साथ ही दुर्लभ भालू पाए जाते हैं। सफेद भालू की उपस्थिति से इसकी अलग पहचान है। भालू लैंड मरवाही में भालू व आम लोगों के संघर्ष आम घटना हो गई है। भालू के हमले से लोगों को सुरक्षित करने जामवंत योजना प्रारंभ की गई थी जिसे अब तक अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका है। परिणाम स्वरूप भालू की जीवन संकट में है। जंगल में अवैध पेड़ की कटाई के कारण सघनता घटती जा रही है। वहीं पानी की कमी भोजन की तलाश में भालू आबादी वाले क्षेत्र की ओर रुख करने लगे हैं। मरवाही के समीपस्थ माड़ाकोट, गंगनई, सेमरदर्री, चिल्हान नाका में भालू का प्राकृतिक रहवास है। इन क्षेत्र में भालूओं का आतंक ज्यादा है। पिछली कुछ घटनाओं में सेमरदर्री, चिल्हान, भर्रीडांड़ में भालू के हमले से ग्रामीण घायल भी हो चुके हैं। कई घटनाओं में लोगों की जान भी जा चुकी है। जामवंत परियोजना के अंतर्गत क्षतिपूर्ति भी आज तक अधर में लटकी है। भालू के आक्रमक होने से आए दिन घटनाएं हो रही है। घटनाओं को रोकने व भालूओं को सीमित क्षेत्र पर रोकने के लिए शासन ने वर्ष पूर्व जामवंत परियोजना लागू की गई थी। प्रदेश में योजना के तहत चार क्षेत्र में बांटा गया था इसमें से एक मरवाही भी था। योजना के तहत भालू रहवासी क्षेत्रों का चयन कर उसके भोजन की व्यवस्था कर क्षेत्रवासियों को प्रशिक्षण दिया जाना था। इसके खानापूर्ति के लिए भानू मित्र दल का गठन किया गया है। भालू के हमले से घायल लोगों के लिए क्षतिपूर्ति राशि प्रदान करना मुख्य था। इसमें कुछ विशेष कार्य व क्षेत्रों को अंकित किया गया था इसमें वनों में फलदार पौधरोपण, जल स्त्रोत का निर्माण, गुफाओं की पहचान एवं उसका प्रबंधन मानव बस्ती में हमला रोकने भालू सहायता केंद्र स्थापित करना था। मरवाही के माड़ाकोट में पहाड़ पर प्राकृतिक गुफाओं को भालू रहवास के रूप में अंकित भी किया गया था पर विभाग की उदासीनता व योजना की अनदेखी से जामवंत योजना अब तक अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका है। बीस वर्ष से योजना ठंडे बस्ते में चली गई है।

क्या है जामवंत परियोजना

पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने परियोजना के लिए विधानसभा में पहले चरण में पांच करोड़ स्वीकृत करने की घोषणा की थी। इस राशि से जंगल में भालुओं के लिए पेयजल व भोजन के विकल्प तैयार करने के साथ ही आदमखोर भालुओं के हमले से घायल व मृत लोगों के परिवार को मिलने वाली मुआवजे राशि में बढ़ोतरी की गई थी। जिसके तहत मृत व्यक्ति के परिजनों को तीन लाख से बढ़ाकर पांच लाख रुपए व घायलों को पांच हजार के बजाय अब 25 हजार रुपए दिए जाने की बात कही गई थी। पांच करोड़ से जामवंत परियोजना के तहत भालुओं के रहवासी वाले क्षेत्र में फलदार पौधे, जल संरक्षण, सोलर वायर फैंसिंग, तालाब व पुराने प्राकृति जलस्रोत के नवीनीकरण के साथ ही स्टॉपडेम का निर्माण किया जाने की बात कही गई थी वहीं पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने मरवाही में देश का सबसे दुर्लभ सफेद भालुओं का रहवास को सुरक्षित और संरक्षित करने की जरूरत बताया था।

फलदार पेड़ पौधों का अभाव

सेमरदर्री के सरपंच प्रतापसिंह भानु ने बताया कि जंगल में फलदार पेड़ पौधे नहीं लगाए गए हैं। जंगल के भीतर पानी की व्यवस्था पर्याप्त नहीं की गई है। इसके कारण भालू गांव की ओर आ जाते हैं और मानव से मुठभेड़ के दौरान इंसानों को घायल कर कर चले जाते हैं। जामवंत योजना विफल रही है।

अमल में लाने की जरूरत

दिलीप साहू ने कहा जामवंत परियोजना अब तक कागजों में ही दिखाई देती है। जमीनी स्तर पर इस पर कोई भी कार्य देखने को नहीं मिला है। इसके अमल में लाने से भालू और ग्रामीणों के बीच संघर्ष को टाला जा सकता है।

कार्ययोजना सतह में नहीं

जनपद सदस्य एवं वन स्थाई समिति के सभापति अर्जुन सिंह मार्को ने बताया कि क्षेत्र में जामवंत परियोजना भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई है। योजना का नाम ही सुनने को मिलता है इस पर अब तक कोई काम देखने को नहीं मिला है। इसके अमल में आने से फायदा मिलेगा।

कोई भी पहल नहीं की गई

मरवाही के सरपंच योगेंद्र सिंह नहरेल ने बताया कि जामवंत परियोजना पूर्व विधायक भंवरसिंह पोर्ते की एक अनूठी पहल थी। यह उनका सपना था पर यह सपना सपना ही रह गया है। जामवंत परियोजना के लिए शासन प्रशासन व क्षेत्रीय प्रतिनिधियों द्वारा अब तक कोई भी पहल नहीं की गई है।

योजना कागजों में सीमित

जनपद सदस्य प्रतिनिधि विशालसिंह उरेती ने बताया कि जामवंत परियोजना कागजों में सीमित है। इसके लाभ से पूरी योजना भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई है। अगर इस कार्य रूप में परिणित किया जाए तो इसके लाभ से क्षेत्र का विकास होगा। साथ ही भालूओं को बचाया जा सकेगा।

जंगल की सघनता में कमी

ज्ञान सिंह ओट्टी ने बताया कि परियोजना के अलावा भी जंगलों में पेड़ों की कटाई व दोहन से जंगल की सघनता में बहुत कमी आई है। परियोजना अगर लागू होती तो जंगल को सघन व फलदार किया जाता। इससे भालू ग्रामीणों के रहवास की ओर नहीं आते। इसे रोका जा सकता था।

चारा -पानी की व्यवस्था की जाएगी

मरवाही ब्लाक कांग्रेस के अध्यक्ष मनोज गुप्ता ने बताया कि जामवंत परियोजना मरवाही क्षेत्र के लिए अहम है। हमारी सरकार भी प्राथमिकता में कार्य कर रही है। भालुओं को जन हानि से बचाने के लिए जंगल में फलदार पौधे लगाने एवं पानी के लिए छोटे-छोटे तालाब बनाकर चारा -पानी की व्यवस्था की जाएगी। इससे गांव की ओर नहीं आएंगे न ही जनहानि होगी। वन विभाग के अधिकारियों ने पूर्व में क्या काम किया कुछ पता नहीं है।

रेंज को चार भागों में बांटा गया है। जहां भालुओं की संख्या ज्यादा है वहां भालू मित्र दल बनाया गया है। जो क्षेत्र में निगरानी कर भालुओं की रक्षा करते हैं। कुंआ या तारों में गिरने या फंसने पर उन्हें बचाते हैं। गांव वालों को मुनादी कर ग्रामीणों को भालुओं से दूर रखते हैं। वे कुएं में गिरे भालुओं को बचाते हैं। 54 हेक्टेयर में फलदार पेड़ लगाया गया है साथ जंगल में तालाबों का निर्माण किया गया है।

-वी.माथेशरन,डीएफओ , मरवाही

Posted By: Nai Dunia News Network

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