नारायणपुर। बस्तर क्षेत्र का एक प्रसिद्ध बनोपज टोरा का सीन खत्म होने जा रहा है लेकिन अभी तक शासकीय खरीदी नहीं शुरू हो पाई है। वन विभाग द्वारा विभिन्ना वनोपज की खरीदी में टोरा भी शामिल है, जिसका शासन द्वारा निर्धारित मूल्य 29 रुपये प्रति किलो है, जबकि व्यापारियों द्वारा वनवासियों को 30 रुपये दिया जा रहा है। शासन के निर्धारित मूल्य से ज्यादा कीमत व्यापारियों से मिलने पर वनवासी साप्ताहिक बाजारों में व्यापारियों को बेच देते हैं। इस वर्ष महुए की फसल कम होने के कारण टोरा भी कम निकलने की संभावना जताई जा रही है।

वनवासियों के लिए वन जीविका का साधन भी है। वनों से प्राप्त वनोपज से जहां वनवासियों के जीविकोपार्जन की व्यवस्था होती है। यह वनवासियों के लिए आय का प्रमुख साधन भी है। इन्हीं वनोपज में एक नाम है टोरा। टोरा एक बीजनुमा फल है, जिसका वनवासी तेल निकाल कर खाने के उपयोग में लेते हैं। आदिवासियों में शादी ब्याह के हरिद्रालेपन कार्यक्रम में हल्दी के साथ टोरा तेल का ही उपयोग किया जाता है।

बारिश के मौसम में खाने में भी ज्यादातर टोरा तेल ही इस्तेमाल करते हैं। टोरा का अलग से पेड़ नहीं होता बल्कि महुए के पेड़ से महुआ के झड़ने के बाद फल के रूप में टोरा फलता है। जिले में प्रतिवर्ष टोरा फल की खरीदी लगभग 500 टन होती है।

स्थानीय व्यापारियों की माने तो इस वर्ष 300 टन तक पहुंचना भी मुश्किल है। अबूझमाड़ क्षेत्र में महुए के पेड़ कम होने के कारण जिले के अन्य क्षेत्रों में टोरा की फसल अधिक होती है।

वन परिक्षेत्र अधिकारी वीरभद्र देवांगन ने बताया कि टोरा की विभागीय खरीदी में विक्रेता को उसकी राशि का नगद भुगतान न कर उनके खाते में डाला जाता है। इस कारण लोग साप्ताहिक बाारों में व्यापारियों को नगद बेच देते हैं। इससे उन्हें वनोपज की राशि का भुगतान तुरंत मिल जाता है।

Posted By: Nai Dunia News Network

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