0 बाहर से आए संगठन के लोगों को नहीं दिया गया प्रवेश, जमीन को लेकर सबसे ज्यादा विवाद

0 विशेषज्ञों को सुनवाई से रखा गया दूर, ग्रामीणों की समझ से बाहर

रायगढ़ । नईदुनिया न्यूज

खरसिया ब्लॉक के कुनकुनी में डीबी पॉवर के रेल लाइन बिछाने को लेकर प्रशासन द्वारा सोशल इम्पेक्ट असेसमेंट की सुनवाई रखी गई थी। कुनकुनी के करीब 68 ग्रामीण इस रेल लाइन से प्रभावित हो रहे हैं। ग्रामीणों को न तो इसके बारे में कोई जानकारी है और न ही इसके लिए ग्रामीणों को कोई पूर्व सूचना दी गई थी। खास बात यह है कि सोशल इम्पेक्ट असेसमेंट में दखल रखने वाले विशेषज्ञों को इससे दूर रखा गया। इस दौरान प्रशासन की पुलिस की पुख्ता इंतजाम किए गए थे। सुनवाई के दौरान 68 ग्रामीणों में से मात्र 22 प्रभावितों ने ही अपनी बात रखी।

डीबी पॉवर के रेल लाइन के लिए आयोजित होने वाली सामाजिक सामाघात निर्धारण अध्ययन के दौरान सारे नियमों को दरकिनार कर दिया गया। सुनवाई में सिर्फ उन्हें ही शामिल किया गया जो प्रभावित थे, जबकि उन्हें यह पता भी नहीं था कि आखिर यह कौन सी बला का नाम है। प्रभावित ग्रामीण सुनवाई में पहुंचे तो जरूर लेकिन सुनवाई स्थल से करीब 2 सौ मीटर दूरी पर बैठे रहे। कुनकुनी के 68 ग्रामीणों में से मात्र 22 प्रभावित ही अंदर पहुंच कर अपनी बात रखे शेष सुनवाई स्थल पर पहुंचे ही नहीं थे। मामले कहा जा रहा है कि प्रशासन द्वारा सामाजिक सामाघात निर्धारण अध्ययन को लेकर होने वाली सुनवाई की सूचना ग्रामीणों को दी ही नहीं गई थी। दो दिन पूर्व जारी नोटिस गांव में चपका कर फोटो लेकर निकाल दी गई। सूत्र बताते हैं कि बुधवार को ही सुबह-सुबह गांव में मुनादी कराई गई और उन्हें सुनवाई के लिए बुलाया गया था। ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि दो दिन पूर्व कंपनी के लोगों द्वारा गांव में एक सूचना चस्पा कर उसकी फोटो ली गई और फिर निकाल कर चलते बने। ग्रामीणों को गांव के चौकीदार से प्राप्त जानकारी के अनुसार ही पता चला कि डीबी पॉवर के रेल लाइन के लिए जनसुनवाई रखी है। बाद में पता चला कि यह जन सुनवाई नहीं रेल लाइन बिछाने से पड़ने वाले सामाजिक प्रभाव का एक अध्ययन है और इस पर ग्रामीणों की राय ली जानी है। कुनकुनी के 61 किसानों की 45.87 एकड़ भूमि रेल लाइन में जा रही है। इस जमीन पर करीब 546 हरे भरे वृक्ष है जिसकी बलि दी जाएगी।

आदिवासी बाहुल्य है ग्राम कुनकुनी

खरसिया ब्लॉक का कुनकुनी ग्राम आदिवासी बाहुल्य गांव है और अनुसूचित क्षेत्र होने से यहां पेसा एक्ट लागू है। इससे इसके लिए पहले कुनकुनी के ग्रामीणों की ग्राम सभा प्रस्ताव पर अनुमोदन होना चाहिए था। सोशल इम्पेक्ट एसिस्मेंट अर्थात सामाजिक सामाघात निर्धारण अध्ययन को पहले ग्राम सभा में रखना था। यही वजह है कि ग्रामीण पुख्ता तरीके से अपनी बात को अधिकारियों के समक्ष अपनी बात नहीं रख सके। सामाजिक सामाघात निर्धारण के लिए होने वाली सुनवाई का सही तरीके से नहीं होने को लेकर प्रभावित ग्रामीणों में आक्रोश है।

मुआवजे का हकदार कौन

रेल लाइन के लिए अधिग्रहित होने वाली भूमि का मुआवजा किसे मिलेगा। जो इसका मूल भूमि स्वामी आदिवासी परिवार को मिलेगा या फिर उन्हें जिन्होंने आदिवासियों की जमीन को औने पौने दाम पर खरीद लिया है। दर रेल लाइन के ली जाने वाली जमीन को पहले कंपनी के अधिकारी व भू-माफियाओं द्वारा औने पौने दाम पर खरीद ली गई है। कुनकुनी के आदिवासियों के छले जाने का यह पहला मामला नहीं है। अभी यहां 3 सौ एकड़ आदिवासियों की जमीन घोटाले में संलिप्त लोगों पर कोई कार्रवाई नहीं हो सकी है। रेल लाइन के दायरे में आने वाली आदिवासियों की जमीन को भी या तो गैर आदिवासी ने खरीद रखी है या फिर कंपनी के अधिकारियों द्वारा ली गई है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि इसके मुआवजे व बोनस का वास्तविक अधिकारी कौन होगा। रेल लाइन के लिए हुई बेनामी खरीदी बिक्री में प्रशासनिक संरक्षण स्पष्ट रुप से सामने आ गया है।

सामाजिक संगठनों को रखा दूर

खास बात यह है कि प्रभावित ग्रामीण आदिवासियों की ओर सामाजिक सामाघात विषय पर बात रखने के लिए पहुंचे विशेषज्ञों को सुनवाई बिलकुल दूर रखा गया। ग्रामीणों की ओर बात रखने पहुंचे सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ताओं को पुलिस ने अंदर जाने से रोक दिया। इस दौरान कई सामाजिक व राजनैतिक संगठन के कार्यकर्ताओं के साथ पुलिस की जमकर हुज्जतबाजी भी हुई अंत में इन कार्यकर्ताओं को बिना बात रखे वापस लौटना पड़ा।

क्या है सामाजिक प्रभाव

दरअसल कुनकुनी आदिवासी बाहुल्य गांव है यहां होने वाली आज की सुनवाई इसी पर आधारित है। जिसे सोसल इम्पेक्ट असेसमेंट अर्थात सामाजिक सामाघात निर्धारण अध्ययन है। जिसमें आदिवासियों की उनकी परंपरा, धार्मिक व सामाजिक व सांस्कृतिक पर पड़ने वाला प्रभाव पर चर्चा होनी थी। रेल लाइन के स्थापित होने से आदिवासियों की जीवन शैली पर भी प्रभाव पड़ेगा। लेकिन ऐसे विषयों पर सुनवाई में कोई चर्चा हुई नहीं हुई और न ही इसके विशेषज्ञों को अंदर जाकर ग्रामीणों की ओर से बात रखने का मौका दिया गया।

पुलिस के कड़े पहरे के बीच हुआ

कुनकुनी के शासकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय सुनवाई स्थल को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया था। यहां पर पुलिस के कड़े पहरे के बीच सामाजिक सामाघात निर्धारण पर सुनवाई हुई। इस दौरान ग्रामीणों की ओर से बात रखने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं व राजनैतिक दलों को अंदर जाने से रोक दिया गया। इस दौरान लोगों व पुलिस के बीच जमकर बहस भी हुई।

किसान समझ ही नहीं पाए कि करना क्या है। प्रत्यक्ष रुप से 68 किसान प्रभावित हो ही रहे हैं लेकिन अप्रत्यक्ष रुप से पूरा कु नकुनी गांव प्रभावित हो रहा है। एसआईए होता क्या है इसकी बारे में ग्रामीणों को कोई जानकारी ही नहीं है ऐसे में वे बोलेंगे। कुछ प्रभावित यहां आएं है लेकिन ये दूर बैठे हुए हैं। यह सुनवाई प्रशासन की हठधर्मिता के तहत विधि सम्मत नहीं हुई इसे निरस्त किया जाना चाहिए। ग्रामीणों को एसआईए की जनसुनवाई की जानकारी सुबह ही मिली है। 170 ख के तहत यह स्पष्ट नहीं है कि मुआवजा के असली वारिस कौन होगा।

राजेश त्रिपाठी

सामाजिक कार्यकर्ता

मेरे पास इस समय कुछ भी इस मसले पर बताने का समय नहीं है, हमें जो करना था करा दिया। आप लोग नियम जानते ही हैं, मैं कुछ नहीं बता पाउंगा।

दुर्गेश वर्मा

एसडीएम खरसिया

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