रायगढ़। नमक कानून तोड़ो की तर्ज पर साल 2011 से कोयला कानून तोड़ रहे 56 गांव के ग्रामीणों ने इस बार गांधी जयंती को ग्राम पेलमा में कोयला कानून को तोड़कर कोयला सत्याग्रह आंदोलन में मेरी जमीन मेरा हक मेरा का नारा बुलंद किया। यह आंदोलन साल 2011 से हर साल जिले के गारे - पेलमा गांव में होता है। कानून को तोड़कर ग्रामीणों की ओर से यह मांग की जा रही है कि कोयला खनन एवं बिक्री करने का हक उन्हें दिया जाए। वे खननकर सीधे सरकार को बचने की बात कह रहे है इसके लिए बाकायदा कंपनी भी बनाए है।

ग्रामीणों ने बताया कि इस बार पेलमा गांव में कोयला सत्याग्रह का आयोजन किया गया। जहां बड़ी संख्या में लगभग 56 गांव के लोग कोयला कानून को तोड़कर कोल सत्याग्रह किया। इसकी तैयारी ग्रामीणों की ओर से पिछले एक माह से की जा रही है। गांव-गांव में इस सत्याग्रह का प्रचार किया जा रहा था। बैठकें की जा रही थी और ग्रामीणों को हमारी जमीन हमारा कोयला के नारे के विषय में जागरुक किया जा रहा था। ग्रामीणों का कहना है कि जब जमीन उनकी है तो उसके अंदर के कोयले पर सरकार किसी और को क्यों हक देना चाहती है।कोई भी बाहरी कंपनी आकर उनकी जमीन को खोदकर चला जाता है, वो मालामाल हो जाता है और हम भू-स्वामी से नौकर बनते हैं फिर कंगाल हो जाते हैं। यह अन्याय है। उल्लेखनीय है कि पेलमा में एसईसीएल के लिए कोल ब्लाक प्रस्तावित है। हलांकि ग्रामीणों की ओर से इसका पुरजोर विरोध किया जा रहा है। वही आज खनन से पहले दूसरे राज्य से प्रमुख रूप से डेमे ओरांव ओडिशा, सुशांत पाणीग्राही ओडिशा, सतीश कुमार आंध्रप्रदेश, उमेश ऋषि झारखंड,

पराशर झारखंड ,जीरा मनी देवी झारखंड, नागेश कुमार सिंह झारखंड पर्यावरणविद एवं अन्य सामाजिक कार्यकर्ता जल जंगल जमीन से जुड़े लोगो ने इस पर आम सभा में अपनी बातें को रखी थी। जहां कई कानून के बारे में ग्रामीणों को जानकारी भी दी गई। इसके अलावा स्थानीय नेताओं ने प्रदेश सरकार पर वादा खिलाफी का आरोप लगाते हुए कहा कि तत्कालीन भाजपा शासन के कार्यकाल में वर्तमान मुख्यमंत्री भूपेश बघेल द्वारा सराईटोला गांव में सरकार बनते ही सामुदायिक खनन का अधिकार देने की बात का वायदा किया था पर अब यह ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।

मेरा जमीन मेरा हक मेरा कोयला बिक्री के मंडी बनाने की मांग

ग्रामीणों ने बताया कि हमारी परंपरा में जमीन को मां की संज्ञा दी गई है। इन हालात में हम अपनी जमीन को किसी और के हाथ कैसे सौंप सकते हैं। सबसे पहले तो हम कोल ब्लाक के लिए अपनी जमीन नहीं देंगे। इसके बाद भी यदि सरकार को देश के विकास के लिए कोयला ही चाहिए तो उसे खनन का हक हमे दिया जाए। हमारे लिए धान मंडी की तर्ज पर कोल मंडी स्थापित किया जाए ताकि हम अपने जमीन के कोयले को बेच सकें। अपनी जमीन का कोयला हम किसी अन्य हाथों से खोदने नहीं देंगे। ग्रामीणों का कहना है कि जमीन मेरा है तो हक भी मेरा है फिर कोयला भी हमारा है ।

पुलिस प्रशासन व खदान गार्ड भी रहे चौकस

दो अक्टूबर के दिन गारे एवं अन्य गांव के ग्रामीणों द्वारा विगत कई वर्षों से मेरा जमीन मेरा कोयला मेरा हक आंदोलन कर रहे है इसे देखते हुए बड़ी संख्या में महिला, पुरुष, बच्चे कोयला क़ानून को तोड़ते है। इसे देखते हुए सुरक्षा के मद्देनजर बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात रही।

गारे ताप उपक्रम प्रोड्यूसर कंपनी भी बनाए ग्रामीण

किसी भी कार्य को करने के लिए विधिवत कंपनी का होना जरूरी है जो सरकारी मापदंड के अनुरूप हो। इसे देखते हुए व खनन की मांग को लेकर प्रभावित ग्रामीणों ने वर्ष 2012-13 में गारे ताप उपक्रम प्रोड्यूसर कंपनी भी बनाए है। ग्रामीणो ने बताया कि जब वर्तमान मे जिंदल, अडाणी व अन्य कोयला खनन कंपनी कोयला उत्खनन करती है अगर जब सरकार खनन व अन्य कानून बनाएगी तो वे इसी कंपनी के तहत कोयला उत्पादन कर बिक्री करेंगे यही वजह है कि सामुदायिक अधिकार कानून की मांग हो रही हैं।

वर्जन

12 साल से ग्रामीण मेरा जमीन मेरा अधिकार के तहत नमक कानून की तर्ज पर आंदोलन कर रहे है।

समुदायिक हक की बात कहीं जा रही है। जब प्रदेश में भाजपा सरकार थी। तब मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सराईटोला में आकर

सामुदायिक खनन दोहन का अधिकार देने का वादा किया था। अब जब 2018 से सरकार को 4 साल हो गए वादे से पलट रही। ग्रामीण सतत मांग कर रहे है इसी तारतम्य में 2 अक्टूबर को कोयला सत्याग्रह किया गया।

राजेश त्रिपाठी, आंदोलन प्रमुख पर्यावरणविद

Posted By: Yogeshwar Sharma

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