संदीप तिवारी, रायपुर। Inspirational News: राजधानी से 100 किलोमीटर दूर बेमेतरा के नवागढ़ गांव के 35 वर्षीय युवा किसान किशोर राजपूत पिछले छह साल से औषधियों की खेती कर रहे हैं। वे तुलसी, अश्वगंधा, कालमेघ (चिरैता), गिलोय, पाषाणभेद, केवाच, काली हल्दी, सर्पगंधा, सतावर, नींबूघास आदि की खेती कर रहे हैं। हर साल करीब 30 क्विंटल औषधियों के उत्पाद छत्तीसगढ़ के स्थानीय एजेंटों के माध्यम से दिल्ली, गुजरात और पश्चिम बंगाल की कंपनियों को बेच रहे हैं।

किशोर न केवल खुद 10 से 12 लाख रुपये शुद्ध मुनाफा कमा रहे हैं, बल्कि गांव के कई युवकों को रोजगार भी दे रहे हैं। युवक ने खुद की फर्म औषधीय खेती शोध संस्थान भी बना रखी है। किशाेर राजपूत बताते हैं कि कोरोना काल में औषधीय खेती की मांग बढ़ गई है। साल 2021-22 में एक करोड़ रुपये का टर्न ओवर रखा है।

कोरोना काल में इस बार कंपनियों ने खस, पामारोज, जीरेनियम, विष्णुकांता, वच, पिपली की खेती करने के लिए आग्रह किया है। अब इसकी तैयारी कर रहे हैं। किशाेर कहते हैं कि बचपन से ही आयुर्वेद पर लगाव रहा है। कोरोना काल में औषधि पौधों की मांग बढ़ने से उत्साह भी बढ़ गया है।

दो एकड़ से शुरू हुआ था सफर अब 100 एकड़ तक पहुंचा

किशोर बताते हैं कि उनके पास खुद की दो एकड़ जमीन थी जिसमें मुनाफा नहीं हो रहा था, घर में आर्थिक तंगी थी तो लगा कि दो एकड़ में अकेले धान उत्पादन से क्या होगा। इसी सोच के मारे युवक ने खेती में बदलाव करने की सोची। पहले दो एकड़ में तुलसी लगाया और जब फायदा हुआ तो युवक ने आसपास से 70 एकड़ जमीन लीज पर लेकर काम शुरू किया।

अब 70 एकड़ में औषधि और ब्लैक राइस की खेती करने लगे हैं। इसके अलावा वह दुर्लभ किस्म के धान की संगृहीत 56 किस्मों का भी उत्पादन कर रहे हैं। अब 100 एकड़ में खेती करने की तैयारी चल रही है।

देखादेखी 100 किसान परिवार भी जुड़े

किशोर राजपूत से 100 किसान परिवार जुड़ चुके हैं। किसान अपनी उपज को बेचने और तकनीकी मदद के लिए इनके पास पहुंचते हैं। औषधीय खेती करने वाले किसानों से किशोर का बेहतर नेटवर्क बन चुका है। खासकर तुलसी का उत्पादन करने वाले किसान इनसे सीधे जुड़े हैं। राज्य में ही कुछ फर्म तुलसी का अर्क बनाते हैं और पौधे इनके पास से ले जाते हैं।

कृषि विवि से ले चुके हैं प्रशिक्षण

किशोर राजपूत ने औषधीय खेती करने से पहले इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर में आयोजित प्रशिक्षण कार्यशाला में हिस्सा लिया था। इसके बाद उनके भीतर औषधीय खेती करने की रुचि जागी। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डा. एसके पाटिल कहते हैं कि कृषि विवि निरंतर ऐसे मेहनती युवाओं को प्रशिक्षित करने का काम कर रहा है। इससे आने वाले समय में खेती के क्षेत्र में आमूलचूक परिवर्तन देखने को मिलेगा।

Posted By: Shashank.bajpai

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