रायपुर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। हमेशा नया सीखने की जिज्ञासा रखिए। केवल पढ़ाई ही नहीं, विषय विशेषज्ञ बनने का प्रयत्न करिए। जीवन में अध्ययन और स्वाध्याय कभी बंद नहीं करना चाहिए। ज्ञान बुरा नहीं होता। विश्व के वक्ता बनिए। लेखक बनिए। जीवन में ऐसा ज्ञान प्राप्त करिए, जिसकी सुगंध विश्व के धरातल तक फैले। यह संदेश फाफाडीह स्थित दिगंबर जैन मंदिर में आचार्य विशुद्ध सागर ने दिया।

आचार्य ने कहा कि जीवन में रत्नों की परीक्षा के लिए जैसे पढ़ाई करनी चाहिए, वैसे रत्नत्रय की परीक्षा के लिए जिनवाणी पढ़नी चाहिए। व्यक्ति को चंदन के सुगंधित वृक्ष को जानना है तो शेष वृक्षों को भी जानना पड़ेगा। शेष वृक्षों का ज्ञान नहीं होने पर चंदन की पहचान नहीं हो सकती। जीवन में एक बार वस्तु के वस्तुत्व को समझ लेना, जिसके बल पर तीर्थंकर, अरिहंत, सिद्ध बना जा सकता है, वह वस्तु के वस्तुत्व का स्वभाव है। जीवन में सु-पुरुषार्थ करोगे तो सदगति होगी। यदि कु-पुरुषार्थ करोगे तो नारकीय गति होगी।

आहार सुधारें

जिनको अपनी बुद्धि तीक्ष्ण चाहिए, उन्हें अपना भोजन परिवर्तन करना होगा। जैसे कोई अच्छा वक्ता बनना चाहता है, संगीतकार बनना चाहता है तो उसे खटाई, मिठाई और चिकनाई बेसुरा बना देती है। आपको अच्छा वक्ता बनना है, संगीतकार बनना है तो कोकिल कंठ चाहिए। इसके लिए अपने कंठ की रक्षा वैसे ही करना होगा जैसे बच्चों का पालन किया जाता है।

हर धर्म, हर व्यक्ति का मंत्र है नवकार महामंत्र- संत ललितप्रभ

इष्ट फल की प्राप्ति और मुक्ति का आधार है महामंत्र नवकार। जिस मंत्र के पहले, बीच में और अंत में कोई बीजाक्षर लगाने की जरूरत नहीं होती, जिसे ऊपर से बोल लो तो वही परिणाम और नीचे से शुरू कर बोल लो तो भी वही परिणाम, बीच में से बोल लो तब भी वही परिणाम। एक पद या शुरुआत के पदों को बोल लो तब भी वही परिणाम। यह वह महामंत्र है, जिसमें किसी भगवान का नाम नहीं पर दुनिया में ऐसी कोई ईश्वरीय शक्ति भी शेष नहीं जो इसमें न आई हो। उक्त बातें संत ललितप्रभ महाराज ने कही।

Posted By: Ashish Kumar Gupta

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