रायपुर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। धर्म का मूल दया है, हिंसा करना धर्म नहीं है। अपने लिए जीना सभी जानते हैं, जो जगत के जीवों के कल्याण के लिए जीते हैं, वे महापुरुष होते हैं। जैसा अपने लिए चाहते हो दूसरों के लिए भी चाहना सीखो।

यह संदेश सन्मति नगर फाफाडीह दिगंबर जैन मंदिर में आचार्य विशुद्ध सागर ने दिया। आचार्य ने कहा कि खून बहाने से राज्य नहीं चलता, वात्सल्य बहाने से राज्य चलता है। भगवान श्रीराम वात्सल्य बहाकर चले गए और सबके दिल में बस गए। धर्म बचाना है तो संतान को सुरक्षित करो। अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दो। आपके बच्चे किसके साथ बैठ रहे और किस भावना से बैठ रहे, यह ध्यान दो। अपनी बुद्धि को विशाल करो और क्षमता को बढ़ाओ।

जीवन में सिर्फ मित्र मत बनाओ, मीत बनाओ। मीत बनेंगे तो मैत्री भाव स्थापित होगा। हाथ मिलाने वाले, गले मिलने वाले बहुत होंगे लेकिन गलत राह में जाने से रोकने वाले मीत कम होते हैं। जैसे सोने की पहचान परखने से होती है, मनुष्य की पहचान मिलने से होती है।

मुनि प्रणव सागर ने कहा कि जीवन में स्वयं के लक्षण को जानना आवश्यक है। खुद के लक्षण को जाने बगैर लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होगी। समय पर समय को नहीं समझ पाए तो आज जैसे हो कल भी ऐसे ही रहोगे। संसार चलता रहेगा। जीवन में जब भी खुशी या दुख के दिन आए तो एक ही बात सोचना कि यह समय भी निकल जाएगा। सब पुण्य पाप का खेल है, सब कर्म का खेल है। समय को सोना बना दो या सो कर गुजार दो यह आपको सोचना पड़ेगा।

Posted By: Pramod Sahu

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