रायपुर। वनों से आदिवासियों की बेदखली के सुप्रीम कोर्ट के आदेश व भारतीय वन अधिनियम में संशोधन के खिलाफ छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन (सीबीए) व अन्य जन संगठनों के संयुक्त तत्वाधान में सोमवार को धरना होगा और सीएम हाउस तक मार्च करेंगे।

सीबीए संयोजक आलोक शुक्ला ने बताया कि आदिवासियों और अन्य परम्परागत वन निवासियों के साथ हुए एतिहासिक अन्याय की भूल को सुधारते हुए उनके वनाधिकारों को मान्यता देने के लिए वनाधिकार मान्यता कानून 2006 बनाया गया।

कानून लागू होने के एक दशक बाद भी इसका सही ढंग से क्रियान्वयन नहीं हुआ इसके कारण लाखों लोग अपने वनाधिकारों से वंचित हैं। सिर्फ छत्तीसगढ़ में ही वनाधिकार के पांच लाख व्यक्तिगत दावों को गैरकानूनी रूप से, कानून की गलत व्याख्या करते हुए ख़ारिज कर दिया गया।

सामुदायिक और सामुदायिक वन संसाधनों के अधिकारों की मान्यता लगभग नगण्य हैं। ऐसी स्थिति जब वनाधिकार मान्यता कानून का सही तरीके से पालन भी नहीं हो पाया हैं। केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली मोदी सरकार इसे कमजोर करने का भरसक प्रयास कर रही हैं।

केंद्रीय वन मंत्रालय ने ऐसे कई आदेश जारी किये जो वनाधिकार मान्यता कानून के विपरीत हैं। मोदी सरकार की मूल मंशा वनों को कार्पोरेट हाथों में उनके मुनाफे के लिए सौपने की है।