रायपुर। कमल विहार-2 (टाउन डिवलेपमेंट स्कीम-5) के रद्द होने के बाद सरकार की एक और बड़ी योजना खारुन रिवर फ्रंट पर संकट मंडरा रहा है। इसका कारण यह है कि सर्वे में खारुन नदी के दोनों तरफ 76 फीसदी से अधिक निजी जमीन निकल गई है। निजी जमीनों के स्वामियों को मुआवजा बांटने में सरकार को करोड़ों रुपए देने होंगे। इसी कारण सर्वे के बाद अब प्रोजेक्ट का न डीपीआर (डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट) बनवाया जा रहा है और न ही अलग से प्राधिकरण के गठन को लेकर कोई हलचल है।

कंसल्टेंट कंपनी वेप्कास को मार्च 2017 तक सर्वे रिपोर्ट और फिर, डीपीआर सौंपना है। कंपनी ने सर्वे रिपोर्ट तो दे दी है, लेकिन डीपीआर नहीं बना रही है। इसके बिना सरकार योजना को आगे नहीं ले जा सकती। कंसल्टेंट कंपनी को डीपीआर बनाने के लिए कहा भी नहीं जा रहा। इसका कारण सर्वे रिपोर्ट है। उसके मुताबिक खारुन रिवर फ्रंट के लिए 1193 हेक्टेयर सरकारी और निजी जमीन का उपयोग होगा। इसमें से 905 हेक्टेयर निजी जमीन है। सर्वे रिपोर्ट जब अधिकारियों के हाथ में आई तो निजी जमीन और प्रभावितों को मुआवजे का अनुमान लगाकर ही हाथ-पैर फूल गए हैं। इसी कारण आठ माह से प्रोजेक्ट को लेकर कोई बातचीत ही नहीं हो रही है। इसी कारण महादेव घाट और कुम्हारी घाट की तरफ अलग से सौंदर्यीकरण और आमोद-प्रमोद का काम शुरू करा दिया गया है।

क्या है कॉन्सेप्ट

साबरमती रिवर फ्रंट की तरह यहां खारुन नदी के दोनों तरफ टाउनशिप का कॉन्सेप्ट बना। नदी के एक तरफ महादेव घाट रायपुर और दूसरी तरफ कुम्हारी घाट दुर्ग जिला है। कंसल्टेंट कंपनी ने दोनों तरफ 20-20 किमी लंबी और 500-500 मीटर चौड़ी जमीन में टाउनशिप बनाने का सुझाव दिया। टाउनशिप में न केवल आवास, बल्कि व्यवसायिक भवन, घाट निर्माण, जलक्रीड़ा की सुविधा, सामाजिक, सांस्कृतिक, पर्यावरण, पर्यटन सुविधा विकसित करने के लिए नौका विहार, साइकिल ट्रैक, रिवर व्यू और सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने का सुझाव दिया गया है।

20 अरब लागत, 37 अरब मुआवजा पहुंचेगा

रायपुर के जिन गांवों की जमीन लेने का विचार हुआ, वहां की कृषि जमीन का सरकारी रेट प्रति वर्गफीट औसतन 190 रुपए है। कंसल्टेंट कंपनी ने 905 हेक्टेयर (नौ करोड़ 74 लाख 13 हजार 389 वर्ग फीट) निजी व कृषि जमीन लेने का सुझाव दिया है। निजी और कृषि जमीन की कीमत 18.50 अरब रुपए होती है। नई भू-अर्जन नीति के तहत शहर में सरकारी दर से दो गुना और ग्रामीण क्षेत्र में चार गुना मुआवजा देना है। इस हिसाब से सरकार को प्रभावितों को कम से कम 37 अरब रुपए मुआवजे में बांटने होंगे, यह राशि योजना की अनुमानित लागत 20 अरब के लगभग दोगुनी है।

16 गांवों की निजी जमीन लेनी होगी

सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक खारुन रिवर फ्रंट के लिए 16 गांवों को शामिल करने का सुझाव है। इसमें रायपुर जिले के नौ गांव भाठागांव, रायपुरा, सरोना, चंदनडीह, अटारी, हथबंद, गोमची, गुना और बाना और दुर्ग जिले के सात गांव खूडमुड़ा, अमलेश्वर, भोथली, मरगघटा, कुम्हारी, कपसदा और अकोला गांव शामिल हैं।

कंसल्टेंट कंपनी वेप्कास के साथ जुलाई 2015 में अनुबंध हुआ था। कंपनी को सर्वे और डीपीआर बनाकर देना था। इसके एवज में उसे 3.70 करोड़ का भुगतान करना था। कंपनी ने मार्च 2016 में सर्वे रिपोर्ट दी है, जिसकी फीसदी 50 लाख हुई है। आरडीए ने इस राशि का भुगतान किया है। सरकार से यह राशि आरडीए को नहीं मिल पाई है। इस पर पत्राचार करेंगे। सर्वे का भुगतान नहीं हुआ है, इसलिए कंपनी कंसल्टेंट डीपीआर नहीं बना रही है।

महादेव कावरे, सीईओ, आरडीए

खारुन रिवर फ्रंट प्रोजेक्ट पर सरकार ने अभी कोई निर्णय नहीं लिया है। इसलिए, प्रोजेक्ट को लेकर अभी कुछ नहीं कह सकते।

संजय शुक्ला, सचिव, आवास एवं पर्यावरण

मेरे पास अभी तक खारुन रिवर फ्रंट प्रोजेक्ट की कोई भी रिपोर्ट आरडीए या किसी दूसरे सरकारी विभाग से नहीं पहुंची है। इस प्रोजेक्ट पर अभी सरकार ने कोई निर्णय नहीं लिया है।

राजेश मूणत, मंत्री, आवास एवं पर्यावरण

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