रायपुर। छत्तीसगढ़ के धुर नक्सल प्रभावित बस्तर संसदीय क्षेत्र में पहले चरण में 11 अप्रैल को मतदान होना है। टिकट को लेकर कांग्रेस-भाजपा दोनों दलों में कवायद तो चल रही है पर इतना लगभग तय है कि दोनों दलों में इस बार भी राजनीतिक परिवारों की विरासत की जंग ही होगी। बस्तर सीट पर पिछले 20 साल से कांग्रेस जीत नहीं पाई है।

एक जमाना था जब बस्तर कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था। 1996 में कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा ने पार्टी से बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़ा था। वे जीत गए पर इसके बाद कांग्रेस कभी नहीं जीत पाई। 1996 से पहले चार बार बस्तर के गांधी कहे जाने वाले कांग्रेस नेता मानकूराम सोढ़ी बस्तर के सांसद रहे।

1998 के चुनाव में भाजपा के बलीराम कश्यप ने जीत दर्ज की और इसके बाद से इस सीट पर भाजपा का कब्जा बरकरार है। बलीराम कश्यप की मृत्यु के बाद उनके बेटे दिनेश कश्यप ने पहले उपचुनाव में और फिर 2014 के आम चुनाव में जीत दर्ज की। इस बार भी भाजपा से टिकट दिनेश कश्यप को ही मिलने की ज्यादा संभावना है।

उनके भाई केदार कश्यप छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार में 15 साल तक मंत्री रहे, हालांकि 2018 के विधानसभा चुनाव में वह खुद भी हारे और भाजपा सत्ता से बाहर हो गई। भाजपा अगर बस्तर सीट से प्रत्याशी बदलेगी तो दिनेश की जगह केदार को टिकट देगी, लेकिन टिकट रहेगा तो बलीराम कश्यप के परिवार के ही पास। यही स्थिति कांग्रेस में भी बन रही है।

कांग्रेस में मानकूराम सोढ़ी की मृत्यु के बाद दो बार महेंद्र कर्मा, एक बार उनके बेटे दीपक कर्मा भाजपा के बलीराम कश्यप से हार चुके हैं। बलीराम कश्यप की मृत्यु के बाद हुए उपचुनाव में उनके बेटे दिनेश ने कांग्रेस सरकार में वर्तमान में मंत्री कवासी लखमा को हराया था। यानी यहां जंग तो राजनीतिक परिवारों में ही होती रही है, यह अलग बात है कि भाजपा का पलड़ा लगातार भारी रहा।

दोनों दलों की एक जैसी रणनीति

भाजपा बलीराम कश्यप के दोनों बेटों दिनेश और केदार में से किसी एक को टिकट देगी। कांग्रेस में महेंद्र कर्मा के बेटे छबिंद्र कर्मा, लखमा के बेटे हरीश कवासी, पूर्व सांसद मानकूराम सोढ़ी के बेटे पूर्व मंत्री शंकर सोढ़ी समेत एक दो और दावेदार हैं। बस्तर की लड़ाई बड़ी है इसलिए ज्यादा संभावना यह है कि कांग्रेस भाजपा की विरासर को ध्वस्त करने अपनी पार्टी से भी किसी राजनीतिक विरासत वाले परिवार को ही टिकट देगी।

बस्तर क्यों है महत्वपूर्ण

अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित बस्तर संसदीय सीट दोनों दलों के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न है। बस्तर से देश भर के आदिवासी इलाकों में संदेश जाता है। नक्सल प्रभावित इस इलाके में चली हवा प्रदेश को भी प्रभावित करती है। यही वजह है कि हर चुनाव में दोनांे पार्टियां अभियान की शुरूआत यहीं से करती रही हैं।