रायपुर। नईदुनिया प्रतिनिधि

रामकृष्ण मिशन विवेकानंद आश्रम के तत्वावधान में आयोजित श्रीरामचरित मानस प्रवचन श्रृंखला में मैथिलीशरण भाईजी महाराज ने कहा कि वक्ता के हृदय में बैठा जो तत्व है, वही तत्व श्रोता के हृदय में बैठकर कथा सुनता है। भक्त कभी भगवान से मोक्ष नहीं मांगता है। भरतजी ने भगवान से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष नहीं मांगा।

उन्होंने बताया कि भरतजी ने रघुनाथ पद में रत रहने का वरदान मांगा। मोक्ष भक्ति से होता है, भक्ति शरीर से होती है। जो भगवान के सौंदर्य को देख लेता है, उसका जीवन धन्य हो जाता है। उन्होंने कहा कि रामचरित मानस की आलोचना नहीं करनी चाहिए। आलोचना से रामराज्य नहीं बनेगा। भगवान की कृपा से मिली वस्तुएं, सुख, आनंद, संतोष देती हैं, नींद अच्छी देती हैं। संसार की वस्तुओं को प्राप्त कर भक्त भगवान को समर्पित कर देता है।

लक्ष्य के भेद से महापुरुष संसारी हो जाता है

मैथिलीशरण ने कहा कि लक्ष्य के भेद से एक मनुष्य संसारी हो जाता है तो एक महापुरुष बन जाता है। भगवान का भक्त उस वस्तु का बहुत सम्मान करता है, जिससे उसे भगवान मिल जाते हैं। वे कहते हैं कि यही तनु राम भक्ति में पाई। केवल लक्ष्य से उसका नाम बदल जाता है। वरदान या अभिशाप उसके उपयोग पर निर्भर करता है कि आप उसका उपयोग कैसे कर रहे हैं। संत अपने व्यवहार से अनंत प्रेम करते हैं। उनके व्यवहार में संसार विश्वास नीति देखता है। यही संतों की विशेषता है।

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