रायपुर। नईदुनिया प्रतिनिधि। Cesarean operation प्रसव के बीच कोख पर पड़ रहे टांकों से माताएं सिसक रही हैं। शायद इस पीड़ा का अहसास वह जननी ही कर सकती है, जिसे सिजेरियन ऑपरेशन के चलते जिंदगी भर दर्द झेलना पड़ रहा है। वह भी तब, जब कई केस में सामान्य प्रक्रिया से भी बच्चे का जन्म हो सकता है। निजी और सरकारी अस्पतालों में ऑपरेशन और सामान्य प्रक्रिया से प्रसव के फीसद में एक बड़े अंतर से बच्चे के जन्म को लेकर व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर रहे हैं।

दरअसल प्रसव के दौरान सरकारी अस्पतालों में जितने सामान्य प्रक्रिया से बच्चे होते रहे हैं, उनसे अधिक बच्चों का जन्म निजी अस्पतालों में ऑपरेशन माध्यम से हो रहा है। मां की कोख में उन टांकों का दूरगामी परिणाम देखने को मिलता है। नतीजा ये हो रहा है कि समय के साथ महिलाओं की हड्डियां कमजोर होने के साथ ही कमर में दर्ज और अन्य परेशानियां देखने मिल रही हैं, जिसके चलते अधिकांश महिलाओं को मां बनने के बाद से जिदंगी भर चिकित्सकों के पास इलाज के लिए जाना पड़ रहा है।

आपको बता दें कि स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार अकेले राजधानी में जहां वर्ष 2019-20 की स्थिति में सरकारी अस्पताल में 15,264 नॉर्मल वहीं 4,172 बच्चे ऑपरेशन से हुएं हैं, वहीं इसके उलट निजी अस्पतालों में सिर्फ 3500 बच्चे नॉर्मल और 7,827 बच्चे ऑपरेशन से हुए।

क्यों दिख रहा अंतर

चिकित्सक ने बताया कि प्रसव के दौरान चिकित्सकों को धैर्य रखना पड़ता है। वहीं निजी अस्पतालों में समय का अभाव होता है। इसके चलते निजी अस्पतालों में प्रसव के दौरान अधिक समय तक इंतजार न कर ऑपरेशन के माध्यम से डिलिवरी करा देते हैं। वहीं शासकीय अस्पतालों में चिकित्सक सामान्य प्रसव के लिए इंतजार करते हैं। गंभीर स्थिति में ही ऑपरेशन किया जाता है। इसके अलावा निजी अस्पतालों में ऑपरेशन से डिलिवरी को खर्च से जोड़कर भी देखा जाता है।

ऑपरेशन का एक बड़ा कारण ये भी

वर्तमान में अधिकांश महिलाएं योगा व व्यायाम से दूर हैं। खानपान को लेकर भी स्थिति ठीक नहीं। कई महिलाएं प्रसव के लिए पूरी तरह परिपक्व नहीं होती हैं। जिसे देखते हुए आजकल सिजेरियन ऑपरेशन से प्रसव को प्राथमिकता दी जा रही। लेकिन इससे महिलाओं में जिंदगी भर के लिए शरीर से संबंधित कई परेशानियां शुरू हो जाती है। वहीं अधिकांश नॉर्मल डिलिवरी ग्रामीण महिलाओं का होता है। इसका कारण उनका सरकारी अस्पतालों में जाना व कामकाजी होने के कारण शारीरिक रूप से बेहतर होना माना जा रहा है।

राजधानी के शासकीय अस्पतालों में प्रसव

वर्ष - नॉर्मल - ऑपरेशन

2017-18 - 20757 - 5287

2018-19 - 19870 - 5047

2019-20 - 15264 - 4172

कुल - 55891 - 14506

निजी अस्पतालों की स्थिति

वर्ष - नॉर्मल - ऑपरेशन

2017-18 - 5465 - 11744

2018-19 - 6850 - 11663

2019-20 - 3500 - 7827

कुल - 15815 - 31234

एक्सपर्ट व्यू

1, सामान्य प्रसव को बहुत देर तक देखना पड़ता है। इसके लिए धैर्य की आवश्यकता है। प्राइवेट अस्पतालों में समय के अभाव के चलते जल्दबाजी की जा रही है। लेकिन शासकीय अस्पतालों में हमारा फोकस सामान्य प्रसव पर ही होता है। इसलिए स्थिति गंभीर होने पर ही ऑपरेशन किया जाता है। नहीं तो नॉर्मल डिलिवरी होता है। सरकार की पूरी कोशिश है कि शत प्रतिशत महिलाओं का प्रसव शासकीय अस्पतालों में हो। आप देखेंगे कि सरकारी में बेहतर सुविधा और इलाज के कारण लोगों का भरोसा बढ़ा है। और अधिक संख्या में महिलाओं का प्रसव सरकारी अस्पतालों में ही हो रहा है।

डॉ. मीरा बघेल, सीएमएचओ, जिला रायपुर

एक्सपर्ट व्यू

2, सामान्य प्रसव हर हिसाब से बेहतर और महिलाओं के लिए उचित है। बसर्ते मां और बच्चे के स्वास्थ्य पर कोई विशेष हानिकारक प्रभाव न पड़ने वाला हो। हमारी कोशिश रहती है कि शत प्रतिशत नॉर्मल ही डिलिवरी हो, क्रिटिकल कंडिशन को देखते हुए कई बार हमें अंतिम समय पर ऑपरेशन करना पड़ जाता है। माताओं के लिए रूट के हिसाब से नॉर्मल डिलिवरी ही बेहतर होता है। ऑपरेशन कंडिशन देखते हुए करते हैं। लेकिन उसमें बाद में काफी परहेज की जरूरत पड़ती है। इसलिए गर्भवती माताओं को कोशिश करनी चाहिए, कि समय समय पर चिकित्सकीय सलाह और अपने स्वास्थ्य का बेहतर तरीके से ध्यान रखे।

- डॉ. ज्योति जायसवाल, स्त्री रोग विशेषज्ञ, आंबेडकर अस्पताल

Posted By: Nai Dunia News Network

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