रायपुर। बस्तर का चुनाव देश ही नहीं दुनिया भर की सुर्खियां बटोरता है। यहां चुनाव के दौरान नक्सली हिंसा आम बात है। हत्या, लूटपाट, बम विस्फोट, दहशत मचाने के लिए जगह-जगह काटी गईं सड़कें, सड़कों के नीचे गड़े बम और वूबी ट्रेप, पेड़ों पर टंगे पोस्टर जिनमें चुनाव बहिष्कार की धमकियां लिखीं हैं।

इसके बावजूद जंगल में कतार लगाकर वोट डालने के लिए खड़े आदिवासी लोकतंत्र के विजय की गाथा लिखते देखे जा चुके हैं। यहां गनतंत्र पर हमेशा लोकतंत्र जीतता रहा है। इस बार भी जीतेगा। यही बस्तर के चुनाव की खासियत है। इसीलिए बस्तर पर सबकी नजर है।

मंगलवार को दंतेवाड़ा के नीलावाया में डीडी न्यूज के कैमरामैन अच्चुतानंद साहू की हत्या के बाद नईदुनिया के पास मुंबई, दिल्ली जैसे महानगरों से कई पत्रकारों के फोन आए। सब बस्तर आना चाहते हैं। नक्सलियों ने दहशत फैलाने की चाहे जितनी बर्बर कोशिश की हो, वे पत्रकारों का हौसला नहीं तोड़ पाए हैं।

देश ही नहीं दुनिया के अन्य देशों के पत्रकार भी यहां चुनाव देखने के लिए आ रहे हैं। नक्सलियों ने खुद ही कुछ दिन पहले पत्रकारों को अंदर के इलाके में आकर हालात देखने का न्योता दिया था। इसके बाद चार दिन पहले एएनआई की एक कैमरा टीम दंतेवाड़ा जिले के कटेकल्याण ब्लॉक के गाटम इलाके में गई थी। वहां उन पर तीर धनुष से हमला किए जाने की खबर है। वह टीम अब भी दंतेवाड़ा के जंगलों में लोकतंत्र की बयार की रिपोर्टिंग में लगी है। नक्सल इलाकों में कार्यरत पत्रकार कई बार नक्सली गोलीबारी में फंस चुके हैं।

दो पत्रकारों की नक्सली हत्या भी कर चुके हैं। इन घटनाओं के बाद बाहरी दुनिया में हो हल्ला कितना भी मचा हो, बस्तर के पत्रकार अपना काम उसी तरह करते रहे, मानो उन्हें कोई फर्क ही न पड़ा हो। सिर्फ नक्सली ही नहीं, नक्सलगढ़ के पत्रकार पुलिस के निशाने पर भी रहे हैं। कई पत्रकार जेल भी गए। नक्सली वारदात के बाद अक्सर पुलिस का गुस्सा रिपोर्टिंग करने गए मीडिया कर्मियों पर उतरता रहा है। इन सबके बावजूद आदिवासियों का भरोसा लोकतंत्र और मीडिया पर बना हुआ है।

नाव डुबाई, तैरकर गए वोट डालने

पिछले चुनाव में दंतेवाड़ा जिले के इंद्रावती नदी के उस पर बसे कुछ गांवों के मतदान केंद्र नदी के इस पार लाए गए। निर्वाचन आयोग ने मतदाताओं की सुविधा के लिए नदी के घाट पर एक बोट की व्यवस्था की। चुनाव के दो दिन पहले नक्सलियों ने वह बोट नदी में डुबा दी ताकि कोई वोटिंग करने न जा पाए। आदिवासियों ने पतली डोंगी के सहारे और तैरकर नदी पार की और वोट डालने पहुंचे।

अंगुली काटने की धमकी भी नहीं करती असर

नक्सलगढ़ में जगह-जगह पोस्टर लगे हैं जिनमें वोट डालने पर अंगुली काटने की धमकी दी गई है। इन धमकियों के बाद प्रशासन ने अंदरूनी इलाकों के मतदाताओं को अमिट स्याही से छूट देने पर विचार भी किया। नक्सली हर बार यह धमकी देते हैं। बाद में गांव में जाकर वोटरों की अंगुली चेक करते हैं और उनकी पिटाई भी करते हैं।

इसके बावजूद बस्तर के सुदूर जंगलों में हर बार वोटिंग होती है। मतदान का प्रतिशत हालांकि कम होता है लेकिन इसकी वजह नक्सलियों का भय नहीं है बल्कि यह इसलिए होता है क्योंकि वहां मतदान केंद्र बहुत दूर-दूर होते हैं। वोटरों को कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। इन बाधाओं के बावजूद लोकतंत्र जीत रहा है।

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