रायपुर। मुस्लिम धर्म में ऐसी मान्यता है कि यदि हज पर जाने का मौका मिल गया तो समझो उनका जन्म लेना सार्थक हो गया। उन पर खुदा की कृपा है कि उन्हें हज पर जाने का खुशनसीब मौका मिला। हज की यात्रा करने से बढ़कर दूसरी कोई इच्छा नहीं होती। जिसने हज के अरकाम पूरे कर लिए उससे बड़ा खुशनसीब और कोई नहीं होता। सभी की एक ही इच्छा होती है कि हज की यात्रा के दौरान कोई शारीरिक कष्ट न हो और यात्रा सफलतापूर्वक पूरी हो जाए। कइयों की तो यह सोच होती है कि हज यात्रा पूरी होने के बाद भले ही जीवन की सांसें रूक जाए पर कम से कम एक बार तो हज पर जाने का सौभाग्य मिल जाए।

इसी सोच के साथ रविवार को 500 से अधिक लोग प्रदेशभर से राजधानी पहुंचे और अपना स्वास्थ्य परीक्षण करवाकर आवश्यक टीकाकरण करवाया। छत्तीसगढ़ राज्य हज कमेटी ने टीकाकरण का आयोजन किया था ताकि सउदी अरब की बदली फिजाओं में किसी भी तरह की बीमारी पास न फटके। टीका लगवाने बस्तर इलाके से लेकर धमतरी, कांकेर, महासमुंद, राजिम, गरियाबंद आदि जिलों से हज पर जाने वाले लोग आए। इनमें पति-पत्नी, माता-पिता, बेटा-बहू और अन्य रिश्तों में बंधे परिजन शामिल थे।

बेटी के शुभ कदम ने बदली किस्मत

मूलतः ग्राम भानपुर, जिला डिण्डोरी मध्यप्रदेश और कई साल से रायपुर के नयापारा मस्जिद के समीप रहने वाले मोहम्मद शमीम रजा अपनी पत्नी अफसाना और पांच माह की बच्ची नूरे-एन के साथ हज पर जा रहे हैं। वे बताते हैं कि बच्ची के जन्म से उनकी किस्मत बदल गई।

सोचा नहीं था कि इतनी जल्दी हज पर जाने का मौका मिलेगा। जब हज पर जाने फार्म भरने का समय आया तो हमने ये सोचकर भर दिया कि इस साल नहीं तो फिर कभी जाएंगे। पहली बार में ही जब हमारा नाम निकला तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा। मेरी बच्ची के घर में कदम पड़ने से ही मुझे और पत्नी को बच्ची के साथ यात्रा पर जाने का मौका मिल रहा है।

पत्नी की वजह से दूसरी बार जाने का सौभाग्य

नेहरूनगर निवासी बुजुर्ग हाजी प्यारे खान बताते हैं कि 2006 में वे हज पर अकेले गए थे। इसके बाद पत्नी हसीना बानो 13 साल से हज पर जाने की सोच रही थी। इस साल उसे हज पर जाने खुदा का बुलावा आ गया। उसके नसीब से मैं भी 13 साल बाद हज पर जा रहा हूं। वहां जाकर छत्तीसगढ़ के सभी लोगों के लिए दुआएं मांगूंगा।

82 साल की वृद्धा चलने-फिरने से मजबूर लेकिन हिम्मत-जज्बा कायम

कोण्डागांव के समीप फरसगांव निवासी 82 साल की आयहूर बानो चलने-फिरने से मजबूर है। वे बिना सहारे के चल भी नहीं सकती। इसके बावजूद हज पर जाने की अंतिम ख्वाहिश दिल में बरकरार है। इसी जज्बे को देखते हुए उनके बेटे मोहम्मद आसिफ और बहू बुसरा बानो उनके साथ हज पर जा रहे हैं। रविवार को वृद्धा जब टीकाकरण कराने राजधानी पहुंची तो बेटा-बहू उन्हें सहारा देकर लाए। वृद्धा के चेहरे पर हज जाने की खुशी छलक रही थी।