रायपुर। छत्तीसगढ़ में तीसरे चरण के चुनाव में सुदूर इलाकों में जमकर मतदान हुआ जबकि शहरी इलाकों के वोटरों में थोड़ी उदासीनता दिखी। सरगुजा, रायगढ़, बिलासपुर, कोरबा के सुदूर इलाकों में चुनाव के दौरान अधिकांश गांवों तक नेता नहीं पहुंच पाए। कई गांवों में पार्टियों और नेताओं के झंडे बैनर तक नहीं दिखे। चुनाव से मुद्दे नदारद रहे। वोटरों को पर्ची नहीं बांटी गई। मुद्दों की चर्चा नहीं हुई।

इन इलाकों में न भाजपा का राष्ट्रवाद दिखा न कांग्रेस का न्याय। फिर भी लोकतंत्र की मशाल जलाने के लिए वोटरों ने ताकत झोंक दी। कई इलाकों में मतदान के लिए ग्रामीण तपती धूप में पैदल चलकर पहुंचे। किसान, मजदूर, आदिवासी, महिला सभी ने उत्साह दिखाया और जमकर मतदान किया। सरगुजा के आदिवासी इलाकों में 75 फीसद से ज्यादा मतदान हुआ। ऐसा ही बस्तर में भी देखा गया था।

नक्सल इलाकों में वोटरों ने ताकत झोंकी थी। सामरी के एक मतदान केंद्र को 13 किमी दूर शिफ्ट किया गया फिर भी वोटर वोट देने आए। बलरामपुर के सीमावर्ती इलाके में नक्सलियों ने विस्फोट कर डराने की कोशिश की लेकिन इसका कोई प्रभाव मतदाताओं पर नहीं पड़ा। लोग झुंड में आए और घंटोें कतारों में लगे रहे। यह लोकतंत्र पर आस्था की अभिव्यक्ति थी।

मुद्दों की बात ही नहीं हुई

ग्रामीण इलाकों तक प्रचार वाहन नहीं पहुंच पाए। शहरों में भी प्रत्याशी हर घर तक नहीं पहुंचे। अधिकांश इलाकों में बैनर पोस्टर नहीं दिखे। प्रचार वाहन सड़कों से भीतर के इलाकों में नहीं पहुंच पाए। ऐसे में मुद्दे कैसे पहुंचते। लोकसभा चुनाव में दोनों प्रमुख दलों ने राष्ट्रीय मुद्दों को उठाया था। कांग्रेस गरीबों के खाते में 72 हजार सालाना देने की बात करती रही तो भाजपा राष्ट्रवाद और सर्जिकल स्ट्राइक पर जोर देती रही। यह मुद्दे भी सुदूर इलाकों तक नहीं पहुंच पाए थे। फिर भी मतदाताओं का उत्साह देखते ही बना।

स्थानीय समस्याओं की चर्चा नहीं हुई

इस चुनाव में वनाधिकार, भूमि अधिग्रहण, शराबबंदी, बेरोजगारी, नक्सलवाद आदि स्थानीय मुद्दों की बात नहीं उठी। विधानसभा में स्थानीय मुद्दों की चर्चा थी पर इस बार कहा गया कि मामला देश का है इसलिए इसकी चर्चा करना जरूरी नहीं है। लोगों की अपनी समस्याएं हैं लेकिन उन समस्याओें की बात किसी भी दल ने नहीं उठाई। इसके बाद भी वोटरों ने ताकत दिखाई है। यह लोकतंत्र का शुभ संकेत है।

Posted By: Hemant Upadhyay