संतोष वर्मा, रायपुर। Chhattisgarh: छत्तीसगढ़ की तिल्दा तहसील का एक गांव है खौना। यहां अनोखी परंपरा है। किसी के भी घर बच्चा पैदा होने पर सबसे पहले सतबहनिया माता को चूड़ी भेंट की जाती है, वह भी काली चूड़ी। माता को नई चूड़ी चढ़ाकर वहां चढ़ी हुई दूसरी चूड़ी उठाते हैं और बच्चे को पहनाते हैं। ग्रामीणों का मानना है कि ऐसा करने से माता प्रसन्न होती हैं, उनकी कृपा प्राप्त होती है और चूड़ी भेंट नहीं करने पर बच्चे को कष्ट होता है। कोई नहीं जानता कि यह परंपरा कब से चली आ रही है। पूर्वज ऐसा करते थे इसलिए लोग पीढ़ी दर पीढ़ी माता को पूजते आ रहे हैं।

सतबहनिया माता अवध राम वर्मा के घर की बाड़ी में विराजित हैं। अवध राम ने बताया कि माता की प्रतिमा की स्थापना उन्होंने नहीं की और न ही उनके स्वर्गीय पिताजी मनबोध वर्मा ने की थी। उनके पिताजी ने उन्हें बताया था कि यह प्रतिमा अपने आप नीम की जड़ से निकली है। अवध के दादाजी के जमाने से इस प्रतिमा की पूजा हो रही है, शायद उसके पहले से। कुछ साल पहले इस प्रतिमा को नीम की जड़ से उठाकर वहीं पर चबूतरा बनाकर स्थापित किया गया।

देखने पर प्रतिमा बहुत पुरानी लगती है। लगता है जैसे वह बच्चा गोद में लिए हुए है। सतबहनिया माता पर लोगों की कितनी आस्था है, इसका अंदाजा वहां चढ़ी चूड़ियों को देखकर सहज ही हो जाता है। नीम के तने पर हजारों चूड़ियां बंधी हुई हैं।

उमा वर्मा (57) ने बताया कि किसी के घर न सिर्फ बच्चा पैदा होने पर, बल्कि गाय-भैंस जनती है तब भी लोग चूड़ी, चना- मुर्रा चढ़ाते हैं। यहां तक किसी की कोई चीज खो जाने पर भी माता के दरबार में माथा टेकते हैं ताकि खोई हुई चीज वापस मिल जाए। आस्था तो इतनी है कि गांव में किसी के भी घर जंवारा बोया जाए, सबसे पहले निमंत्रण सतबहनिया माता को दिया जाता है और कार्य निर्विघ्न संपन्न होने की मन्नत मांगी जाती है।

Posted By: Himanshu Sharma

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