संदीप तिवारी, रायपुर । Chhattisgarh Tribal Language आदिवासी बहुल इलाकों के सरकारी स्कूलों के बच्चे नए सत्र से स्थानीय बोलियों में भी पढ़ेंगे। गोंडी, हल्बी और माड़िया में पढ़ाई के लिए प्राइमरी स्कूलों के लिए पहली से पांचवीं कक्षा तक द्विभाषी किताबें छापी जाएंगी। कहां, कौन भाषा, बोली जाती है, यह जानने के लिए स्कूलों में लैंग्वेज मैपिंग की प्रक्रिया शुरू हो गई है। विभाग ने कलेक्टरों को पत्र जारी कर पुस्तक का अनुवाद स्थानीय भाषा हल्बी, गोड़ी या माड़िया शब्दों में कराने को कहा गया है। स्कूल शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव डॉ. आलोक शुक्ला ने बताया कि 15 फरवरी तक ऐसे स्कूलों का चिन्हांकन भी किया जाएगा, जहां तरह-तरह की बोली के बच्चे पढ़ रहे हैं।

क्षेत्रीय आदमी को पढ़ाने का मौका: क्षेत्रीय बोली जानने वाले आदिवासी बहुल के लोगों को भी पढ़ाने का मौका मिलेगा। इन लोगों की मदद से शिक्षकों को अपग्रेड किया जाएगा।

आप भी दे सकते हैं संदर्भ ग्रंथ

कोई भी विद्वान चाहे तो जनजातियों की बोलियों से संबंधित ग्रंथ शिक्षा विभाग को दे सकते हैं।

15 करोड़ अतिरिक्त होगा खर्च

प्रदेश में पहली से दसवीं तक के 24 लाख से अधिक बच्चों को सरकार नि:शुल्क किताब बांटती है। इनमें अकेले 17 लाख बच्चे प्राइमरी स्कूल के हैं। द्विभाषी किताबें छपने से किताबों में क्षेत्रीयता के आधार पर खर्च अधिक होगा। विभाग को करीब 15 करोड़ रुपए तक अधिक खर्च करने पड़ सकते हैं। अभी किताबों के लिए राज्य सरकार 76 करोड़ रुपए से बजट है।

इतने बच्चों को फायदा

प्रारंभिक सर्वे के मुताबिक अधिकांश गांवों के करीब पांच लाख से अधिक बच्चे ऐसे हैं, जो कि हिंदी नहीं जानते हैं, उन्हें उनकी प्राथमिक शिक्षा पहली से आठवीं तक स्थानीय बोली गोंडी, हल्बी, माड़िया में पढ़ाई करानी है। प्रदेश में 42 जनजातियों की 42 तरह की बोलियां हैं। फिलहाल तीन बोलियों पर सर्वाधिक फोकस है।

Posted By: Sandeep Chourey