रायपुर (रायपुर प्रतिनिधि)। साहित्य जगत में देशभर में प्रसिद्ध रह चुके छत्तीसगढ़ के साहित्यकार स्व.गजानन माधव मुक्तिबोध एक ऐसे साहित्यकार रहे, जिनके जीवन काल में एक भी रचना प्रकाशित नहीं हुई थी। उनकी मृत्यु के पश्चात उनके द्वारा लिखा गया साहित्य जब पाठकों के हाथों में पहुंचा तो वे देखते ही देखते धूमकेतु की तरह साहित्य जगत में छा गए थे। संघर्षों से भरा जीवन उन्होंने गुजारा और ऐसी रचनाएं लिखीं जिन्हें पढ़कर कई लेखकों ने उनका अनुसरण किया। आज भी युवा लेखक श्रीमुक्तिबोध का साहित्य पढ़कर अपनी लेखनी को चमकाने के प्रयास में लगे हैं।

छत्तीसगढ़ हिंदी साहित्य मंडल के अध्यक्ष अमरनाथ त्यागी बताते हैं कि स्व.श्रीमुक्तिबोध की रचनाएं पढ़कर जीवन को संघर्षों से जीते हुए आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है। आज के लेखकों को अच्छा लिखने के लिए स्व.मुक्तिबोध के साहित्य को अवश्य पढ़ना चाहिए। वे जो कुछ भी लिख गए वह साहित्य जगत की अनमोल देन है, उनका लिखा साहित्य ही उनकी पहचान बन चुका है। आज भी साहित्य जगत में उनके योगदान की मिसाल दी जाती है। उनका साहित्य पढ़कर ही बहुत से युवा लेखक कुछ नया लिखने के लिए प्रेरित हो रहे हैं।

बेटों ने पिता की रचनाओं को जिंदा रखा

साहित्यकार स्व.गजानन माधव मुक्तिबोध के पुत्र रमेश मुक्तिबोध, दिवाकर मुक्तिबोध और गिरीश मुक्तिबोध ने अपने पिता के हाथों से लिखी पांडुलिपियों को अपनी मां के माध्यम से सहेजा। अन्य साहित्यकारों के मार्गदर्शन में धीरे-धीरे इन रचनाओं का प्रकाशन करवाया। जब साहित्य को पाठकों ने पढ़ा तो इसके बाद स्व.मुक्तिबोध देशभर में पहचाने गए। उनको दुनिया से रूखसत हुए 57 साल बीत गए। इसके बावजूद उनका साहित्य अमरता की श्रेणी में आ गया है। उनके पुत्र हर साल उनकी पुण्यतिथि 13 नवंबर को साहित्य गोष्ठी का आयोजन करते हैं, जिसमें प्रसिद्ध लेखक, कवि और युवा साहित्यकार भी काफी कुछ सीखने आते हैं।

स्व. मुक्तिबोध की प्रमुख रचनाएं

कविता संग्रह - चांद का मुंह टेढ़ा है, भूरी-भूरी खाक धूल, कहानी संग्रह- काठ का सपना, विपात्र, सतह से उठता आदमी, आलोचना- कामायनी - एक पुनर्विचार, नई कविता का आत्मसंघर्ष, नए साहित्य का सौंदर्यशास्त्र, समीक्षा की समस्याएँ, एक साहित्यिक की डायरी रचनावली- मुक्तिबोध रचनावली (6 खंडों में) अँधेरे में (कविता) एक स्वप्न कथा, एक अंतःकथा, जब प्रश्न चिन्ह बौखला उठा, ब्रह्मराक्षस, भूल-गलती, मैं उनका ही होता, मैं तुम लोगों से दूर हूं, मुझे पुकारती हुई पुकार, मुझे मालूम नहीं, मुझे याद आते हैं, मेरे लोग , शून्य, एक भूतपूर्व विद्रोही का आत्म-कथन, दिमागी गुहांधकार का औरांग उटांग, मुझे कदम-कदम पर, जब दुपहरी जिंदगी पर।

Posted By: Sanjay Srivastava

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