प्रशांत गुप्ता, रायपुर। अयोध्या में मंदिर था...। मंदिर के 84 पिलर थे। दीवारों में हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां उकेरी गईं थीं। मंदिर में 700 साल पुराना शिलालेख भी मिला था, जो इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि मंदिर को तोड़कर ही मस्जिद का निर्माण कराया गया था। यह कहना है छत्तीसगढ़ यानी रामलला के ननिहाल के पुरातत्ववेत्ता पद्मश्री अरुण शर्मा का।

अरुण शर्मा उस टीम के सदस्य रह चुके हैं, जिन्होंने अयोध्या में मंदिर होने के पुख्ता प्रमाण दुनिया के सामने रखे। खुदाई में मिले शिलालेख, मंदिर के अवशेष ही सुप्रीम कोर्ट में हिंदू पक्षकारों का सबसे बड़ा आधार है। यही प्रमाण कोर्ट के फैसले का आधार होंगे।

बुधवार को देश की सबसे बड़ी अदालत में सबसे बड़ी बहस चल रही थी। इस दौरान दैनिक जागरण के सहयोगी प्रकाशन 'नईदुनिया" ने महासमुंद जिले में निवासरत 84 वर्षीय पद्मश्री शर्मा से फोन पर बात की। उन्होंने सिलसिलेवार तमाम जानकारियां दीं। बोले- मुझे 2003 में एक दिन विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंघल का टेलीफोन आया था। उन्होंने कहा कि मुझसे आकर मिलो। उनसे आरकेपुरम में मुलाकात हुई।

बोले- वास्तव में अयोध्या में क्या है, अध्ययन करो। मैंने आर्केलॉजी सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) के साथ मिलकर छह माह तक खुदाई की। जो तथ्य सामने आए वे चौंकाने वाले थे। 2012 में मैंने लखनऊ हाई कोर्ट में इसे रखा कहा था. 'अयोध्या में मस्जिद होने का जो दावा किया जा रहा है, वह सही नहीं है। कभी नमाज पढ़ी ही नहीं गई। अधूरे निर्माण की वजह से उसे ना-पाक कहा जाता था।"

तीन स्तर में हुआ था मंदिर का निर्माण

पद्मश्री शर्मा ने कहा कि मंदिर का निर्माण तीन स्तर पर हुआ। निर्माण वर्ष 1339 है, जबकि वर्ष 1429 में बाबर भारत आया था। शर्मा कहते हैं कि बाबर कभी अयोध्या नहीं आया, उसका सेनापति आया था।

ये हैं श्रीराम के अयोध्या में होने के प्रमाण

पहला प्रमाण- खुदाई में मिला शिलालेख सबसे बड़ा प्रमाण है। जो मंदिर का था। इसलिए श्रीराम मंदिर था।

दूसरा प्रमाण- मंदिर तोड़ा गया, लेकिन मस्जिद बनाने के लिए मंदिर की ही नींव को उपयोग में लाया गया था।

तीसरा प्रमाण- मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई गई, लेकिन मस्जिद के चार कोनों में चार मीनारें होना आवश्यक है, वह नहीं थी। बजू टैंक भी नहीं पाया गया।

चौथा प्रमाण- बाबर कभी अयोध्या नहीं आया, उसका सेनापति आया था। जिस मस्जिद की बात कही जा रही है, उसकी दीवारों पर मूर्तियां उकेरी गईं हैं। इसमें 84 पिलर पाए गए हैं।

(जैसा 'नईदुनिया" को पुरातत्ववेत्ता पद्मश्री अरुण शर्मा ने बताया, जो खुदाई दल के सदस्य थे।)


छत्तीसगढ़ में राम का ननिहाल

ऐसा दावा है कि चंदखुरी भगवान राम की मां कौशल्या का मायका है। देश में उनका एकमात्र मंदिर यहां है। इस लिहाज से छत्तीसगढ़ भगवान का ननिहाल हुआ। ग्रंथों में इस बात का भी उल्लेख है कि लव-कुश का जन्म सिरपुर (जिला महासमुंद) स्थित तुरतुरिया में हुआ। राम वन गमन मार्ग छत्तीसगढ़ से ही जाता है, दंडकारण्य भी छत्तीसगढ़ में ही है। अगर इन सभी तथ्यों को माना जाए तो छत्तीसगढ़ से भगवान श्रीराम का गहरा का नाता है।

Posted By: Hemant Upadhyay