रायपुर। Chhattisgarhi Language : 'दादा जोकाल' का शाब्दिक अर्थ है 'साथी भाई', जिसे वह अपने नाम ही नहीं अपने काम से चरितार्थ कर रहे हैं। हम बात कर रहे हैं राजधानी से 350 किलोमीटर दूर दंतेवाड़ा के कोंटा गांव में जन्मे 'दादा जोकाल' की। बहुत कम लोग जानते हैं कि सिकंदर खान नामक शख्स ही 'दादा जोकाल' हैं।

छत्तीसगढ़ की बोली-भाषा के लिए काम करने के लिए प्रतिबद्ध और खामोश इस कलम के सिपाही को हल्बी, गोंडी, दोरली, तेलगू, दक्किनी, उर्दू और हिंदी में समान दक्षता प्राप्त है। यही वजह है कि दादा जोकाल से राज्य सरकार द्विभाषी किताब छापने से पहले लेखन के लिए मदद लेने जा रही है।

छत्तीसगढ़ सरकार अब प्रदेश के स्कूलों में गोंडी, हल्बी और माड़िया में भी पढ़ाई करवाने के लिए योजना बनाई है। इसमें दादा जोकाल की मदद ली जाएगी। दादा जोकाल ऐसे साहित्यकार हैं, जिन्होंने छत्तीसगढ़ की सात बोली-भाषा में अपना लेखन किया है।

कविता, गजल, नाटक, आलेख, बाल-साहित्य आदि की रचनाएं छत्तीसग़ढ़ की विविध बोलियों को बयां करती हैं। बता दें कि दादा जोकाल राजीव गांधी शिक्षा मिशन के तहत दंतेवाड़ा में सहायक परियोजना समन्व्यक के तौर पर भी कार्यरत रहे हैं।

फिलहाल वे रिटायर हो चुके हैं, पर शिक्षा विभाग के लिए साथी बनकर मदद कर रहे हैं। प्रदेश में पहली से दसवीं तक के 24 लाख से अधिक बच्चों को सरकार निःशुल्क किताब बांटती है। इनमें अकेले 17 लाख बच्चें प्राइमरी स्कूल के हैं। द्विभाषी किताबें छपने से पांच लाख आदिवासी बच्चों को मदद मिलेगी।

दादा ने कराया था कई बोली वाले बच्चों के स्कूल में दाखिला

दादा जोकाल(सिकंदर खान) का दाखिला जनपद प्राथमिक शाला जंगरगुड़ा में उनके दादा चमनखान ने कराया था। उनके दादा चाहते तो पोते को शहर की स्कूल में भी पढ़ा सकते थे, पर उन्होंने अपने पोते दादा जोकाल को बहुभाषा और बोलियां सिखाने के लिए सुदूर अंचल के स्कूल में दाखिला कराया था।

उनकी ख्वाहिश थी कि हिंदी, उर्दू में तो सभी लिखते हैं, मेरा पोता बड़ा होकर आदिवासी बच्चों के लिए लिखे। दादा से प्रेरित होकर दादा जोकाल ने लेखन की प्रक्रिया शुरू कर दी । दादा जोकाल बताते हैं कि नक्सली तथा सलवा जुड़ूम की विभीषिका में पिसकर उनका स्कूल तबाह हो गया, पर उस स्कूल के बच्चों से सीखी बोलियों के अल्फाज उनके लिए वरदान आज भी हैं।

आर्य भाषा परिवार और द्रविड़ा भाषा परिवार के बीच उनका समान वरदहस्त है। आदिवासी सहपाठियों के साथ खेलते-बढ़ते हल्बी, गोंडी , दोरली, तेलगू आदि भाषाओं को बोलना, पढ़ना और लिखना उनके लिए बहुत आसाना रहा। दादा जोकाल ने अनेक किताबों का अनुवाद लोकभाषा में किया है। यही वजह है कि अब बच्चों प्राइमरी की किताबों के अनुवाद का काम करने के लिए पूरी तन्मयता के जुड़े हुए हैं।

इसी सत्र से कई बोलियों में पढ़ाईः राज्य के आदिवासी बहुल इलाकों के सरकारी स्कूलों के बच्चे नए सत्र से स्थानीय बोलियों में पढ़ेंगे। प्राइमरी स्कूलों के लिए कक्षा पहली से पांचवीं तक द्विभाषी किताबें छापी जाएंगी। कहां, कौन-सी बोली, बोली जाती है, यह जानने के लिए स्कूलों में लैंग्वेज मैपिंग की प्रक्रिया लगभग पूरी हो गई है।

स्कूल शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव डॉ. आलोक शुक्ला का कहना है कि प्रदेश के स्कूलों में तरह-तरह की बोली के बच्चे पढ़ रहे हैं। उनको उनके ही मातृभाषा में पढ़ाने के लिए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल सरकार की मंशा है।

इसके लिए ऐसे लेखकों की मदद ली जा रही है जो कि इन बोलियों को बोलने में बेहद सक्षम हैं। डॉ. आलोक शुक्ला कहते हैं कि उनमें से 'दादा जोकाल' ऐसे हैं, जो कि कई बोलियों के ज्ञाता हैं। उनसे मिलकर एक नया अनुभव मिला है वे किताबों के लिए काम कर रहे हैं।

Posted By: Nai Dunia News Network