रायपुर। सरगुजा में अदानी पावर प्लांट के लिए 30 दिसंबर को होने वाली जनसुनवाई का सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों ने विरोध किया है। सामाजिक संगठनों ने आरोप लगाया है कि अदानी पावर ने जनसुनवाई से पहले प्रशासन को जो तथ्य सौंपे हैं, वह गलत है। छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन (सीबीए) ने सरगुजा कलेक्टर को शिकायत करके जनसुनवाई निरस्त करने की मांग की है। सीबीए के संयोजक आलोक शुक्ला ने एक बयान जारी करके कहा कि अदानी पावर के पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट में पावर प्लांट की क्षमता वृद्धि के बारे में कोई प्रस्ताव नहीं दिया गया। पावर प्लांट कहां लगाया जाएगा, इसकी ग्रामीणों से चर्चा नहीं की गई, जबकि नियम के अनुसार ग्राम सभा की अनुमति से प्लांट लगाने के स्थान को तय करना है।

श्री शुक्ला ने बताया कि टर्म ऑफ रिफरेंस (टीओआर) और पर्यावरण इंपैक्ट रिपोर्ट आपस में मेल नहीं खा रही है। दोनों में अलग-अलग जानकारी दी गई है, जिसके कारण जनसुनवाई नहीं हो सकती है। उन्होंने बताया कि जनसुनवाई से पहले पर्यावरण के प्रभाव की रिपोर्ट ग्रामीणों को स्थानीय भाषा या हिंदी में देनी है, लेकिन कंपनी ने पूरी रिपोर्ट अंग्रेजी में तैयार करके ग्रामीणों को दे दी है। उन्होंने बताया कि उनकी शिकायत को सरगुजा कलेक्टर ने यह कहकर टाल दिया कि सभी मुद्दों पर जनसुनवाई में चर्चा होगी।

वहीं मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने अदानी द्वारा सरगुजा जिले में रिजेक्टेड कोयले पर आधारित पॉवर प्लांट लगाने की योजना का तीखा विरोध किया है तथा राज्यपाल और आदिवासी आयोग से आदिवासी अधिकारों के पक्ष में हस्तक्षेप करने की मांग की है। माकपा राज्य सचिव संजय पराते ने कहा है कि सरगुजा संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आता है। यहां पावर प्रोजेक्ट की स्थापना न केवल सुप्रीम कोर्ट द्वारा 1997 में दिए गए समता निर्णय की भावना के खिलाफ है, बल्कि पेसा कानून के खिलाफ भी है।

रिजेक्टेड कोयले का होगा उपयोग

माकपा नेता ने कहा कि अदानी द्वारा इस पॉवर प्रोजेक्ट में परसा ईस्ट, केते बासन कोयला खदान से निकले रिजेक्टेड कोयले का उपयोग किया जाएगा। ऐसे में इस पावर प्लांट को सरकार द्वारा अनुमति देने से न केवल पर्यावरण की क्षति होगी, बल्कि पेसा कानून के तहत आदिवासियों को प्राप्त अधिकारों का भी उल्लंघन होगा।

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