कवर्धा(नईदुनिया न्यूज)। पिछले कई सालों से देवउठनी एकादशी पर विवाह मुहूर्त नहीं होने से शहनाइयों की गूंज सुनाई नहीं देती थी, लेकिन इस साल विवाह मुहूर्त होने से गुरुवार को जिले भर में शहनाइयों की गूंज सुनाई देगी। हालांकि नवंबर में मात्र दो ही विवाह के मुहूर्त है। इसके बाद दिसंबर में 10 विवाह मुहूर्त बताए जा रहे हैं। इधर एकादशी को लेकर विद्वान एकमत नहीं है। हालांकि ज्यादातर विद्वान आज गुरुवार को एकादशी के पक्ष में हैं। मंगलवार को गन्ना के दामों में भी पिछले साल की अपेक्षा 10 रुपये तक की मूल्य वृद्घि देखने को मिली। बता दें कि पिछले कई सालों से देवउठनी एकादशी के मौके पर देव तो उठ जाते थे, लेकिन विवाह मुहूर्त नहीं होने से लोग इस दिन विवाह नहीं कर पाते थे। लेकिन इस साल 26 नवंबर को विवाह का मुहूर्त होने से इस दिन जिले में सैकड़ों की संख्या में विवाह होंगे।

इस तरह है शुभ मुहुर्त

नवंबर माह में 26 नवंबर और 30 नवंबर को विवाह मुहूर्त हैं। जबकि दिसंबर में 2, 6, 7, 8, 9, 10, 11, 12 और 13 दिसंबर को विवाह के लिए शुभ मुहूर्त हैं, इसके बाद मुहूर्त नहीं है। यानी नवंबर और दिसंबर को मिलाकर मात्र 12 विवाह मुहूर्त हैं। इसके बाद 17 जनवरी को गुरु और 11 फरवरी को शुक्र अस्त होने से विवाह नहीं हो सकेंगे। 13 दिसंबर को अंतिम विवाह मुहूर्त रहेगा, इसके बाद वर्ष 2021 में अप्रैल से ही विवाह शुरू हो सकेंगे, तब तक लोगों को मुहूर्त करने के लिए मुहूर्त का इंतजार करना पड़ेगा।

30 रुपये तक बिक रहा गन्ना

देवउठनी एकादशी के पहले दिन बुधवार को 30 रुपये प्रति नग तक गन्नाा की बिक्री हुई। गन्नाा व्यापारियों का कहना था कि वर्तमान में धान की कटाई जारी है, इस कारण गन्ना काटने के लिए श्रमिक नहीं मिल रहे है, जो श्रमिक मिल रहे वो श्रमिक दर ज्यादा ले रहे हैं। इस कारण रेट बढ़ा है। इसके चलते पांच से 10 रुपये तक गन्ना महंगा बिक रहा है। जिले में इस वर्ष करीब 30 हजार हेक्टेयर में गन्ना लगा है। लेकिन ज्यादातर गन्ने की फसल पूर्ण तरीके से पकी नहीं है।

इसलिए कहा जाता है देवउठनी

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देवउठनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। शास्त्रों में लिखा है कि इस दिन भगवान विष्णु चार महीने (जिनको चातुर्मास कहा जाता है) की योगनिद्रा के बाद शयन से जागृत होते हैं। इसलिए इस एकादशी को देवउठनी या देवोत्थान एकादशी के नाम से जाना जाता है और श्रीहरी की इस दिन विधि-विधान के साथ पूजा की जाती है। देवशयनी एकादशी को सभी शुभ कार्य बंद हो जाते हैं और देवउठनी एकादशी के साथ फिर से सभी शुभ कार्य प्रारंभ हो जाते हैं। इसलिए कार्तिक अमावस्या पर दीपावली के अवसर पर देवी लक्ष्मी की आराधना बगैर श्रीहरी के की जाती है, क्योंकि श्रीहरी उस वक्त योगनिद्रा में रहते हैं। देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु के जागने पर देवी-देवता श्रीहरी और देवी लक्ष्मी की एक साथ पूजा कर देव दीपावली मनाते हैं। इसके साथ ही इस दिन से परिणय संस्कार यानी मांगलिक प्रसंगों का प्रारंभ भी हो जाता है।

कई जगहों पर तुलसी विवाह संपन्न हुआ, पटाखे फोड़े गए

दिवाली के 11 दिन बाद एकादशी तिथि पर घरों में तुलसी विवाह संपन्न हुआ। मान्यता है कि साल में आने वाली इस एकादशी पर देव जागते हैं और इसी तिथि के साथ विवाह मुहूर्त शुरू हो जाते हैं। इस तिथि पर तुलसी और शालिग्राम का विवाह संपन्न किया जाता है। शहर के घरों में तुलसी के पौधे पर गन्ने का मंडप सजाकर शालिग्राम का तुलसी के साथ विवाह की रितियां पूरी की गईं। घरों के बाहर रंगोली सजाई गई और पटाखे फोड़कर भगवान के विवाह का उत्सव मनाया गया। देवउठनी एकादशी को छोटी दिवाली के रूप में भी जाना जाता है। ऐसे में दिवाली की तरह ही शहर के हर मोहल्लों में देर रात तक आतिशबाजी होती रही। घरों के बाहर मोहक रंगोली भी सजाई गई।

दीपावली के बाद फिर से बाजार में बढ़ी चहल-पहल

बुधवार को देवउठनी एकादशी के लिए खरीदारी करने सुबह से बाजार में दीपावली के बाद एक बार फिर चहल-पहल दिखाई दी। लोग देवउठनी के लिए पूजा सहित अन्य सामान की खरीदारी किए, वहीं महिलाएं रंगोली खरीदी।

सामग्री फल फूल बताशा और अन्य सामग्री बेचने के लिए पहुंचे हुए थे।

Posted By: Nai Dunia News Network

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