रायपुर। नईदुनिया प्रतिनिधि

हिंदू पंचांग के माघ माह की अमावस्या तिथि पर पवित्र नदियों में स्नान करने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है। इस मान्यता के चलते श्रद्धालुओं ने खारुन नदी के महादेवघाट पर शुक्रवार की सुबह पुण्य की डुबकी लगाई। साथ ही शनि की साढ़ेसाती, ढैया, अढ़ैया से छुटकारा पाने के लिए मौनी अमावस्या पर दिन भर मौन व्रत रखकर भगवान शनिदेव की पूजा-अर्चना करके तिल, तेल, काला कपड़ा अर्पण किया।

शनि पूजा से वापस मिला था विक्रमादित्य को राजपाट

शास्त्रीय मान्यता के अनुसार शनि की साढ़े साती के प्रभाव से राजा विक्रमादित्य पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा था। संपूर्ण राजपाट छिन गया था और चोरी का इल्जाम भी सहना पड़ा था। राजा को कोल्हू के घर कोल्हू खींचने का काम भी करना पड़ा था। राजा की दयनीय दशा देखकर ऋषि-मुनि ने माघ माह की अमावस्या तिथि यानी मौनी अमावस्या को शनिदेव की पूजा करके तेल अर्पण करने की सलाह दी। साथ ही राजा दशरथ द्वारा लिखित शनि स्त्रोत का पाठ करने कहा। राजा विक्रमादित्य ने मौनी अमावस्या पर शनिदेव की पूजा-अर्चना की, तब शनिदेव प्रसन्न हुए और राजा को उनका राजपाट वापस मिला। ऐसी भी मान्यता है कि मौनी अमावस्या पर जिन भक्तों ने नदी में स्नान करके भगवान शनिदेव की पूजा-अर्चना की है। उन पर अगले 10 माह तक राशि परिवर्तन होने पर भी किसी तरह का विपरीत असर नहीं पड़ेगा।

द्वापर युग का शुभारंभ

ग्रंथों में उल्लेख है कि मौनी अमावस्या के दिन द्वापर युग का शुभारंभ हुआ था। यह भी मान्यता है कि इस दिन गंगा का जल अमृत बन जाता है, इसलिये श्रद्धालुओं ने पवित्र नदियों में स्नान करके दान करने की परंपरा निभाई। देश भर की पवित्र नदियों गंगा-जमुना, नर्मदा, सिंधु, कावेरी समेत राजधानी के खारुन नदी तट पर स्नान करने भक्तों की भीड़ लगी रही।

तेल-तिल-जूता का दान

स्नान के बाद भक्तों ने तेल, तिल, सूखी लकड़ी, कंबल, गरम वस्त्र, काले कपड़े, जूते का दान किया।

Posted By: Nai Dunia News Network

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