आकाश शुक्ला। रायपुर। छत्तीसगढ़ में मानसिक समस्या से पीड़ित वयस्कों की संख्या लगातार बढ़ रही है। यहां हर पांचवां वयस्क व्यक्ति किसी न किसी तरह की मानसिक चुनौती का सामना कर रहा है। समस्या की गंभीरता के कारण केंद्र सरकार के निर्देशन में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम का संचालन भी हो रहा है। प्रत्येक स्वास्थ्य केंद्रों के पास सालाना 10-15 लाख तक का बजट तो उपलब्ध है पर बीते तीन साल में एक बार भी दवाओं की आपूर्ति नहीं की गई है। यही वजह है कि मानसिक समस्या की शिकायत लेकर सरकारी अस्पतालों में पहुंचने वाले मरीजों को उपचार नहीं मिल पा रहा है। स्वास्थ्य विभाग ऐसे मरीजों की काउंसिलिंग का दावा करता है पर विभाग के पास मरीजों का पूरा आंकड़ा ही नहीं है। राज्य की यह लचर व्यवस्था इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम को मुंह चिढ़ा रही है।

बता दें कि 2019 में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम लागू किया गया। इसके तहत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर जिला अस्पतालों तक मानसिक बीमारियों के इलाज की सुविधा उपलब्ध कराने की योजना है। इसके लिए स्वास्थ्य विभाग के 60 प्रतिशत मेडिकल अफसरों को बेंगलुरु स्थित निम्हांस (नेशनल इंस्टिट्यूट आफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंस) से प्रशिक्षण दिया जा चुका है। योजना के अंतर्गत रोगियों को चिन्हित कर काउंसिलिंग व इलाज करना है और निश्शुल्क दवा देनी है।

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22 प्रतिशत से अधिक को मानसिक विकार

राज्य में किए गए मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण वर्ष-2019 के अनुसार छत्तीसगढ़ में 18 से अधिक आयु के 22 प्रतिशत से अधिक लोग किसी न किसी मानसिक रोग से ग्रस्त हैं। इनमें तनाव, अवसाद, मतिभ्रम, मेनिया, दुष्चिंता, मादक पदार्थों के सेवन से होने वाली मानसिक समस्याएं आदि शामिल हैं। आंबेडकर अस्पताल की मनोचिकित्सक डा. सुरभि दुबे ने बताया कि वर्तमान में मानसिक रोगियों का आंकड़ा 22 प्रतिशत से अधिक हो गया है।

मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के राज्य नोडल अधिकारी डा. महेंद्र सिंह ठाकुर ने कहा, राज्य में 22 प्रतिशत से अधिक वयस्क किसी न किसी मानसिक समस्या से ग्रस्त हैं। स्वास्थ्य केंद्रों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की योजना है। विभाग के चिकित्सकों को प्रशिक्षण भी दे चुके हैं। दवाएं उपलब्ध न होने की वजह से समस्या आ रही है। हम जल्द व्यवस्था दुरुस्त करेंगे।

प्रदेश के आंकड़ों पर एक नजर

- 1.99 करोड़ से अधिक जनसंख्या 18 वर्ष से अधिक वालों की

- 2100 से अधिक चिकित्सा अधिकारियों को मिला है प्रशिक्षण

- 3.38 लाख से अधिक की काउंसिलिंग, लेकिन इलाज नहीं मिला

- डाक्टरों का प्रशिक्षण हुआ पर दवा के अभाव में अस्पतालों में नहीं मिल रहा उपचार

- राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम को तीन साल से मुंह चिढ़ा रही चौपट व्यवस्था

- राज्य सलाहकारों के पास वर्ष-2022 तक की पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं

Posted By: Ashish Kumar Gupta

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