रायपुर। Spiritual News: मित्रता कैसे निभाई जाए यह भगवान श्रीकृष्ण और उनके बाल सखा सुदामा से सीखना चाहिए। स्वाभिमानी सुदामा गरीबी में दिन गुजार रहे थे, लेकिन अपने मित्र श्रीकृष्ण से मदद लेने द्वारिका नहीं जाना चाहते थे। पत्नी सुशीला के दबाव में वे अपने मित्र से मिलने द्वारिका पहुंचे। महल के बाहर द्वारपालों ने रोका और जब श्रीकृष्ण को संदेश दिया कि सुदामा आए हैं, यह सुनकर महाराजा श्रीकृष्ण नंगे पांव दौड़ते हुए द्वार तक गए और सुदामा को गले लगाकर आवभगत की।

सुदामा ने कुछ नहीं मांगा, लेकिन श्रीकृष्ण ने उन्हें मालामाल कर दिया। यह कथा संदेश देती है कि मित्र की संकट में सहायता करनी चाहिए। उक्त प्रसंग गुलाब नगर गुढ़ियारी में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में कथावाचक कैलाश अवस्थी ने सुनाया।

राजीव साहू की पुण्य स्मृति में आयोजित श्रीमद्भागवत महापुराण में आचार्यश्री ने कहा कि वर्तमान दौर में मित्रता सिर्फ स्वार्थ के चलते की जाती है। सही मायने में मित्रता ऐसी होनी चाहिए कि छोटे-बड़े का भेद न हो। यदि मित्र की परिस्थिति ठीक न हो तो उसकी मदद करनी चाहिए। मदद करते समय मित्र पर अहसान न जताएं।

मित्रता अपने आप में एक परिपूर्ण रिश्ता है। स्वयं श्रीकृष्ण ने इस संसार को सच्ची मित्रता का पाठ पढ़ाया है। अपने मित्र के भेंट में लाए गए सूखे चावल को जिस चाव से श्रीकृष्ण ने खाया, उससे संदेश मिलता है कि यदि कोई प्यार से कुछ खिलाए तो इन्कार न करें, उसका सम्मान बढ़ाएं। प्यार से खिलाया गया भोजन अमृत तुल्य होता है। भोजन का अनादर न करें।

Posted By: Shashank.bajpai

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