रायपुर। प्री मैच्योर बच्चों में पाई जाने वाली अंधेपन की बीमारी ज्यादातर रेटिनोपैथी ऑफ प्री मैच्योर (आरओपी) के कारण होती है। जिसका समय रहते ही इसका चेकअप करवा लिया जाए तो इससे बचा जा सकता है। आरओपी वैसे बच्चों में अधिक पाई जाती है, जो शिशु प्री मैच्योर होते हैं, यानि नौ महीने से पहले जन्म ले लेते हैं, ऐसे सभी बच्चों के पैदा होने के बाद तीन से चार सप्ताह के अंदर स्क्रीनिंग करवाना जरूरी होता है। अगर आरओपी के शिकार बच्चों का समय रहते ही उपचार नहीं किया गया तो ज्यादातर बच्चे अंधे हो जाते हैं। ऐसे बच्चों की अगर समय रहते स्क्रीनिंग हो जाए और बच्चा आरओपी ग्रसित निकलता है तो उसे लेजर टेक्नोलॉजी से अंधेपन से बचाया जा सकता है। उक्त बाते रविवार को एमजीएम अस्पताल में आयोजित आरओपी क्लब मीट-2019 में शिशु नेत्र विशेषज्ञ और आरओपी रोग विशेषज्ञ डॉ. अनिल गांगव और डॉ. स्वप्निल ने बताया।

उन्होंने बताया कि 50 प्रतिशत प्री मैच्योर शिशुओं में आरओपी पाई जाती है। जिसका समय से रेट कैम के माध्यम से स्क्रिनिंग कर लेजरिंग किया जाए और नियमित जांच व चश्मा लगाया जाए तो यह बीमारी पूर्ण रूप से दूर हो सकती है। जिसका चेकअप एमजीएम और अन्य अस्पतालों में बिल्कुल मुफ्त होता है। साथ ही लेजरिंग भी बहुत कम रकम में हो जाता है। इस तरह से नवजात को लेजर टेक्नोलॉजी के तहत अंधेपन से बचाया जा सकता है।

ऐसे शिशुओं में होती है आरओपी

आरओपी ज्यादातर नवजात शिशु जो प्री मैच्योर होते हैं, उसमें पाई जाती है। एमजीएम की डायरेक्टर डॉ.दीपशिखा अग्रवाल ने बताया कि आमतौर पर प्री-मैच्योर शिशु जो नौ महीने से पहले जन्म लेते हैं,ऐसे शिशुओं में आरओपी के कारण अंधापन आ जाता है। इसमें आंख की रेटिना का पर्दा खिंच जाता है।

इससे रेटिना पर दृश्य बनना बंद हो जाता है। यह बीमारी अधिकतर प्री मैच्योर शिशुओं में ही होती है। जिससे निजात पाने का सबसे अच्छा उपाय चार सप्ताह से पहले चेकअप करवाना और अगर आरओपी निकला तो एक दो दिन के भीतर लेजर करवाना है। जिससे इस बीमारी से बचा जा सकता है।

क्या होता है रेटिनोपैथी ऑफ प्री मैच्योर (आरओपी)

गर्भस्थ शिशु के शरीर में ऑक्सीजन की अधिकता से ब्लड वेसेल्स अधिक बन जाते हैं। आरओपी में असामान्य रक्त वाहिकाएं बढ़ती है और रेटिना भर जाता है, जो आंखों में पीछे की ओर होता है। ये असामान्य रक्त वाहिकाओं को नाजुक कर देता है और रिसाव शुरू हो जाता है, या रक्त वाहिकाएं सिकुड़ने लगती है।

नर्सरी में उपचार करके शिशुओं की जान तो बचा ली जाती है,लेकिन अंधेपन से बचाना मुश्किल हो जाता है। इसके चार ग्रेड होते हैं। पहला और दूसरा ग्रेड नॉर्मल होता है, वहीं तीसरी और चौथी अवस्था सबसे खतरनाक होती है। यह बीमारी दो किलोग्राम से कम वजन वाले और वेंटीलेटर पर जन्म लेने वाले नवजातों में होती है।

Posted By: Nai Dunia News Network