रायपुर। छत्तीसगढ़ की जेलों में नक्सल मामलों में बंद आदिवासियों के प्रकरणों पर पुनर्विचार के लिए कांग्रेस सरकार नई कमेटी बनाएगी। नईदुनिया से बातचीत में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज की अध्यक्षता में कमेटी काम करेगी। कमेटी में रिटायर डीजीपी समेत पांच या इससे अधिक विशेषज्ञ रखे जाएंगे। राज्य सरकार जल्द ही कमेटी का खाका तैयार कर लेगी। उसके बाद कमेटी नक्सल मामलों पर पुनर्विचार के लिए बिंदु तय कर प्रकरणों पर सुनवाई करेगी।

भाजपा सरकार में नक्सल मामलों पर पुनर्विचार के लिए निर्मला बुच कमेटी बनाई गई थी। 21 अप्रैल 2012 को सुकमा जिले के मांझीपारा गांव से कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन का माओवादियों ने अपहरण का लिया था।

बातचीत के लिए माओवादियों ने डॉक्टर ब्रह्मदेव शर्मा व प्रोफेसर हरगोपाल को मध्यस्थ बनाया था, जबकि राज्य सरकार ने मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्य सचिव निर्मला बुच व छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्य सचिव एसके मिश्रा को अधिकृत किया था। माओवादियों और सरकार के मध्यस्थों के बीच लिखित समझौते के बाद तीन मई 2012 को माओवादियों ने कलेक्टर को रिहा किया गया था।

समझौते के अनुसार तत्काल राज्य सरकार ने निर्मला बुच की अध्यक्षता में छत्तीसगढ़ के तत्कालीन मुख्य सचिव व पुलिस महानिदेशक की हाईपॉवर कमेटी बनाई थी। माओवादियों ने एक सूची दी थी, जिसमें जेलों में बंद आदिवासियों के नाम थे, उनके प्रकरणों पर प्राथमिकता के साथ कमेटी को पुनर्विचार करना था।

सितंबर 2014 तक बुच कमेटी ने आठ बैठकें करके 650 से अधिक मामलों पर विचार किया था। 350 से अधिक मामलों में जमानत का विरोध नहीं करने की अनुसंशा की थी। भाजपा सरकार ने कमेटी की रिपोर्ट के साथ हलफनामा दिया था, उसके बाद भी जेलों में बंद आदिवासियों को जमानत नहीं मिल पाई थी।

मुद्दा उठाती रही है कांग्रेस

प्रदेश में कांग्रेस जब विपक्ष में थी, तब वह यह मुद्दा उठाती रही कि नक्सल प्रभावित अंचलों में आदिवासियों को झूठे नक्सल मामलों में फंसाकर जेल भेजा जा रहा है। ग्रामीणों को फर्जी तरीके से नक्सली बताकर उनकी हत्या की जा रही है।

बुच कमेटी और भाजपा सरकार पर उठे थे सवाल

बुच कमेटी के कामकाज पर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने सवाल उठाया था, उस पर निर्मला बुच ने कहा था कि उनकी कमेटी केवल अनुसंशा कर सकती है। जमानत दे या न दे, यह अदालत पर निर्भर करता है। इस पर कानूनविदों का कहना था कि भाजपा सरकार राज्यपाल से हस्तक्षेप के लिए कह सकती थी। अपने समझौते का हवाला देते हुए जमानत के लिए वह सुप्रीम कोर्ट भी जा सकती थी।

बस्तर की जेलों में करीब डेढ़ हजार आदिवासी

नक्सल मामलों में बंद आदिवासियों की रिहाई के लिए काम कर रही जगदलपुर लीगल एड ग्रुप की शालिनी गेरा ने बताया कि बस्तर की जेलों में नक्सल मामलों में करीब डेढ़ हजार आदिवासी बंद हैं। दंतेवाड़ा में नक्सल मामले के करीब पांच सौ कैदी हैं। सुकमा और बीजापुर में भी अधिकांश आदिवासी नक्सल मामले में ही बंद हैं। जगदलपुर में करीब छह सौ आदिवासी नक्सल मामले में बंद हैं। कांकेर में भी 50 से ज्यादा ऐसे मामले हैं।

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