होली व्यंग्य: कमलेश पांडेय, रायपुर। घरों से गुझिया की सोंधी-सोंधी खुशबू आ रही। घर-घर मिठास घुली है, लेकिन खबर ये भी है कि राजभवन और सरकार के बीच तल्खी आ गई है। होली से पहले कुलपतियों की नियुक्ति से सरकार के रंग में भंग पड़ गई। छलिया कान्हा ने अपने भाई के नामराशि को भेज दिया। ब्रज मंडल में बल्देव गांव। नाम तो सुना ही होगा। इसी गांव के बल्दाऊ की हलधर छवि भी याद आ गई होगी। युद्ध के मैदान में हलधर बड़े बड़ों के छक्के छुड़ा देते थे। वह लीलाधारी कृष्ण कन्हैया के बड़े भाई कहे जाते हैं। कान्हा के ब्रज में लट्ठमार होली भी होती है और गोपियो के संग रंगों की भी।

ऐन होली से पहले छत्तीसगढ़ी सियासत का होलियाना मूड मिजाज भी ब्रज जैसा हो गया। दाऊ के गाल लाल-लाल हुए जा रहे हैं। गुलाल मलने बल्दाऊ जो आ गए। दाऊ चाहते नहीं थे, बल्दाऊ आएं। बल्दाऊ होली से पहले ही पहुंच गए। अभी गुलाल मला भी नहीं था कि दाऊ के गाल लाल हो गए। बल्दाऊ अपने ओहदे- ठिकाने पहुंचे तो रोकने के लिए दाऊ के मुश्टंडे आ गए। बल्दाऊ भी कमाल के। कमल का हार पहन कर दिखा दी ताकत।

उनके भी समर्थक मुश्टंडे आ धमके। सियासी गरमी पर होली का रंग उबाल मारने लगा। इससे पहले बात कुछ और आगे बढ़ती, प्रहरी बल्दाऊ को कुर्सी पर बिठा गए। बल्दाऊ के पीठ पर राजभवन का हाथ देख दाऊ की खीझ भी सामने आई। करते भी क्या। अब कह रहे हैं नियम बनाएंगे। नियम बनाओ भैया। रोका किसने है। अभी नियमों के पेच खंगाले जाने भी हैं। मामला अदालत में भी है। दाऊ के कारिंदे कह रहे नियुक्ति का विज्ञापन सरकार ने वापस ले लिया था।

... दिलचस्प बात ये है कि कब वापस लिया भैया। बल्दाऊ से पहले या बल्दाऊ के बाद। खैर छोड़ो ये आप दोनों का मामला है। जनता तो बस गुलाल से पहले की लाली देख रही है। दोनों के चेहरों पर। बल्दाऊ का गाल खुशियों के चलते लाल-लाल तो दाऊ के गाल तिलमिलाकर हो गए लाल। अब तो गुलाल गुलाबी नहीं हरा-पीला या लाल लगाना पड़ेगा। तभी पता चलेगा कि होली में गुलाल लगा भी या नहीं। भाई बिना गुलाल की होली कैसी। वैसे दाऊ होली खेलने के पूरे मिजाज में आ गए थे। बस बल्देव धमक गए।

दाऊ ने अपना होलियाना मूड बजट से ही दिखाना शुरू कर दिया था। बजट की ऐसी पिचकारी मारी कि उनके आस-पास तो रंग से सराबोर हो गए लेकिन कहीं-कहीं तो छींटे भी नसीब नहीं हुए। बेचारे चाउर बाबा की बेबसी सदन में दिखी। बोले खाली गढ़ कलेवा खिलाकर काम मत चलाओ दाऊ, कुछ छींटे राजनांदगांव और कर्बधा पर भी मार देते। ये जिले भी होली खेलते हैं।

पी रहे पर चढ़ती ही नहीं

लो भैया। इन्होंने पी और चढ़ी भी नहीं। भाई आपभी सत्ता में रहे। खूब खा-पीकर आए हैं। डोज बढ़ गया होगा। तभी तो पी रहे और चढ़ती भी नहीं। चलो आपने विधानसभा को बताया कि अब शराब चढ़ती ही नहीं। चढ़े भी कैसे। आबकारी बाबा को भी ये वाली नहीं चढ़ती। बस्तर वाली चढ़ती है। सिर चढ़कर बोलती भी है। शराब पर हो हल्ला जब बिना चढ़े इतना है।

गर चढ़ गई तो क्या होगा भैया। चखना भी चट कर जाएंगे। वैसे चखना दुकानदारी के लिए बड़े-बड़े की दिलचस्पी देख अपन तो सोच रहे, छोड़े ये शराब। चलो होली में बनारस घूम आते हैं। बाबा की बूटी और बाबा का हरा-हरा ढर्रा जो मजा देगा, उसकी तरंग में काम चला लेंगे।

Posted By: Himanshu Sharma

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