होली व्यंग: अरुण उपाध्याय, रायपुर। अन्न्दाताओं के उपजाए धान ने इस बार खूब रंग बदला है, खूब दलबदल भी किया। कभी किसी पर भारी पड़ा तो कभी किसी पर अपने रंग का निशाना साधा। हर किसी ने धान से अपने हाथ रंगने की कोशिश की, जिससे मौका मिलते ही पड़ोसी को रंग दिया जाए। धान ने खेत से ही इस बार अपना मूड बना लिया था। इंद्रदेव ने बारिश की तो धान के खराब होने के मुद्दे ने सियासत गरमा दी। नेताजी भी कम नहीं थे, खेत से लेकर खलिहान तक और वहां से खरीदी केंद्र तक की पूरी लकीर खींच रखी थी। जैसे-जैसे धान आगे बढ़ता, वैसे-वैसे राजनीति के रंग भरते गए।

एक दल ने धान का स्वागत किया और अन्न्दाताओं को पूरा मेहनताना देने का दांव फेंक दिया तो दूसरे दल ने इसे अन्न्दाताओं के साथ धोखा बताते हुए धान को खलिहान से विधानसभा तक पहुंचा दिया। नेताजी धान में इतने मगन हो गए थे कि नींद में, सपने में भी खुद को धान के ढेर पर बैठा हुआ पाते थे। धान की रंगत सोने की है और धान की होली खेल कर नेताजी खुद को भी सोने जैसा चमकाना चाहते हैं। शायद यही कारण है कि धान के लिए सड़क पर बैठे किसानों ने ढोलक के साथ फाग भी गा दिया।

इस फाग का वीडियो भी खूब वायरल हुआ है। विपक्षी नेताजी ने फाग गाने को कहा था तो सरकार ने जैसे ही अन्न्दाताओं की बात सुनी, अन्न्दाताओं ने गुलाल खेल कर होली ही मना ली। अब अन्न्दाता को थोड़ी पता है कि नेताजी धान भर कर पिचकारी चला रहे थे, जिससे दूसरे नेताजी को निशाना बना रहे थे।

धान की इस होली में अन्न्दाता कितने शामिल हुए ये तो पता नहीं, मगर नेताजी की होली हो ली है। होलिका दहन में इस बार फिर से प्रार्थना की है, 'हे धान देवता, अगली बार फिर आना। तब पिचकारी से बड़ा निशाना साधेंगे।' धान खाने के चक्कर में जंगली हाथी मदमस्त होकर चलते हैं, वैसे ही नेताजी भी अपनी चाल से

अगले पड़ाव की ओर चल पड़े हैं।

Posted By: Himanshu Sharma

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