रायपुर। पीलिया लीवर से जुड़ा रोग है। लीवर शरीर का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है, इसलिए इसे सेहतमंद रखना बहुत जरूरी है। पीलिया एक सूक्ष्म वायरस से होता है। इसके संक्रमण के कारण व्यक्ति का लीवर सामान्य ढंग से कार्य नहीं कर पाता। फलस्वरूप खून में बिलिरुबिन बढ़ जाता है।

शासकीय आयुर्वेद कालेज के सह-प्राध्यापक डा. संजय शुक्ला ने बताया कि आमतौर पर गर्मियों के मौसम में पीलिया संक्रमण के रोगी बहुतायत में मिलते हैं। इस रोग का प्रमुख कारण दूषित खाद्य तथा पेय पदार्थों का सेवन, दवाओं का दुष्प्रभाव, अनेक रोग एवं आवश्यक साफ-सफाई का अभाव है। गर्मी से राहत पाने के लिए बाजार में बिकने वाले बर्फ मिले शीतल पेय पदार्थों का सेवन करते हैं। कभी-कभी दूषित पानी से बने बर्फ तथा सड़े-गले फलों के कारण पीलिया की संभावना बढ़ जाती है।

आधुनिक एवं आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति के अनुसार पीलिया रोग से बचाव के लिए खान-पान में आवश्यक सावधानी तथा वैयक्तिक स्वच्छता अपनाने की जरूरत है। आमतौर पर यह देखा जाता है कि पीलिया के रोगी इस रोग के उपचार के लिए अंधविश्वास या झाड़फूंक के फेर में पड़ जाते हैं, जो जानलेवा हो सकता है। पीलिया रोग का इलाज आधुनिक एवं आयुर्वेद दोनों पद्धतियों में संभव है।

जन्म से लेकर 16 वर्ष तक बच्चों के लिए हर टीका जरुरी

बच्‍चों के जन्म के साथ समय-समय पर उसका टीकाकरण कराना आवश्यक है। नियमित टीकाकरण न करवाने वाले बधो जानलेवा बीमारी से ग्रसित हो सकते हैं। जन्म से लेकर 16 साल तक की उम्र तक बधो के लिए हर टीका बहुत जरूरी है, क्योंकि यह उसे कई गंभीर बीमारियों से बचाता है। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डा मीरा बघेल का कहना है कि संपूर्ण टीकाकरण शिशुओं के जीवन और भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए सुरक्षा कवच का काम करता है।

उन्होंने बताया कि एक समय हजारों बधाों की जान लेने वाली बीमारियां जैसे पोलियो, स्माल पाक्स आदि का उन्मूलन टीकाकरण के कारण किया जा सका है। आज टीकाकरण के कारण ही बधाों में होने वाली अन्य बीमारियां भी उन्मूलन के कगार पर हैं। शिशुओं को जन्म पर बीसीजी, हेपेटाइटिस-बी का टीका लगाया जाता है। सभी टीके शासकीय चिकित्सालयों में निश्शुल्क लगाए जाते हैं। टीकाकरण शिशुओं को टीबी, पोलियो, रोटावायरस दस्त, काली खांसी, टिटनेस, हेपेटाइटिस-बी, खसरा, हिब-निमोनिया और मेनिनजाइटिस जैसी गंभीर बीमारियों से बचाता है।

Posted By: Ashish Kumar Gupta

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