रायपुर। नईदुनिया प्रतिनिधि

हार्ट लंग मशीन नहीं होने से के चलते आंबेडकर अस्पताल में दिल की बीमारी के इलाज से वंचित बच्ची का आखिरकार चिकित्सकों ने इलाज कर नया जीवन दिया है। टीबी की बीमारी से जूझ रही 14 वर्षीय बच्ची का दिल चूने की झिल्ली में बंद हो गया था। दो साल से सांस लेने की तकलीफ के चलते जिंदगी और मौत से जूझ रही थी। जब आंबेडकर अस्पताल के एसीआइ विभाग में इलाज के लिए पहुंची तो मशीन और इक्यूपमेंट के अभाव में चिकित्सक पीड़ित का इलाज नहीं कर पा रहे थे। लंबे समय से पीड़ित का इलाज नहीं हो पा रहा था। हॉर्ट लंग मशीन आने के बाद चिकित्सकों ने सफल इलाज किया।

मिली जानकारी के अनुसार मरीज को दो साल से सांस लेने में तकलीफ हो रही थी। पहले दोनों पैरों में सूजन हुआ उसके बाद पेट में पानी भरने लगा। धीरे-धीरे बीमारी बढ़ने लगी एवं दो कदम चलना भी दूभर हो गया था। उसको टीबी की शिकायत थी, टीबी का इलाज किया जा चुका था। छाती के एक्स-रे में भी फेफड़ा सामान्य दिख रहा था। फिर भी उसकी सांस फूलने की शिकायत के चलते बिलासपुर के गनियारी स्वास्थ्य केंद्र पहुंचे एम्स दिल्ली के डॉक्टर ने पाया कि मरीज के हृदय के चारों ओर पाई जाने वाली झिल्ली पेरीकार्डियम में कैल्शियम (चूना) जमा हो गया है। इसके कारण हार्ट ठीक से रक्त को पम्प नहीं कर पा रहा है। इसके बाद पीड़ित के परिजनों ने निजी अस्पताल में इलाज कराया। राहत नहीं मिलते देख आंबेडकर के एसीआइ हार्ट सर्जरी डिपार्टमेंट पहुंचे। यहां डॉ. कृष्णकांत साहू ने बच्ची का इलाज शुरू किया। चूंकि उस समय एसीआइ में हार्ट लंग मशीन नहीं थी, इसलिए मरीज को अन्य हॉस्पिटल जाने की सलाह दी गई, लेकिन मरीज की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने के कारण कहीं नहीं जा पा रहे थे। इसलिए कुछ दिन तक दवाइयों से काम चलाने के बाद फिर एसीआइ में हॉर्ट लंग मशीन आ गई। उसकी सहायता से हृदय का ऑपरेशन किया गया।

ऑपरेशन करने वाली टीम में डॉ. केके साहू, डॉ. निशांत चंदेल, एनेस्थेटिस्ट और आइसीयू इंटेसिविस्ट डॉ. ओपी सुंदरानी, एनेस्थेसिया टेक्नीशियन भूपेंद्र, परफ्यूजनिस्ट संदीप एवं डिगेश्वर के साथ सहयोगी नर्सिंग स्टॉफ राजेंद्र, नरेंद्र शामिल हैं। बता दें कि एसीआइ में शासन द्वारा संचालित डॉ. खूबचंद बघेल स्वास्थ्य सहायता योजना के अंतर्गत हार्ट की सभी बीमारियों का निशुल्क उपचार की सुविधा है। भविष्य में अन्य उपकरण एवं मानव संसाधन आने पर ओपन हार्ट, बाइपास सर्जरी, वॉल्व प्रत्यारोपण एवं बच्चों के हृदय रोग के ऑपरेशन भी प्रारंभ किए जा सकेंगे।

हाई रिस्क सर्जरी

चिकित्सकों ने बताया कि यह बहुत ही हाई रिस्क सर्जरी थी, इसलिए डीओटी कंसेट लिया गया क्योंकि ऑपरेशन करते समय कई बार हॉर्ट के फट जाने का खतरा होता है। छाती को बीचोबीच आरी से काटकर खोला गया। हार्ट लंग मशीन का उपयोग करते हुए बहुत ही सावधानी पूर्वक हार्ट के चारों ओर चिपकी झिल्ली एवं चूने (कैल्शियम) को हृदय से अलग किया गया। इस ऑपरेशन को रेडिकल पेरीकार्डियेक्टामी कहा जाता है। यह ऑपरेशन 3 घंटे चला। दो यूनिट ब्लड की आवश्यकता हुई। इस ऑपरेशन के बाद मरीज को चार दिनों तक आइसीयू यानी इंटेसिव केयर यूनिट में रखा गया। यदि सही समय में बीमारी का इलाज या ऑपरेशन नहीं होता तो मरीज का बचना मुश्किल हो जाता।

वर्जन

बच्ची इलाज के लिए पहुंची तो हमारे पास पर्याप्त संसाधन नहीं थे। कुछ ही दिन पहले हॉर्ट लंग मशीन एसीआइ में आई है। केवल मशीन होने से ही ऑपरेशन नहीं होता, उसके लिए दस परफ्यूजनिस्ट एवं अन्य सहायक उपकरण की आवश्यकता होती है। इस मरीज की सर्जरी अत्यंत आवश्यक थी अतः स्थिति की गंभीरता को देखते हुए एक निजी अस्पताल में कार्यरत परफ्यूजनिस्ट की मदद ली गई, जो इस हार्ट लंग मशीन को चला सके। साथ ही साथ अन्य उपकरणों जैसे-ऑक्सीजनरेटर, कैनुला, ट्यूबिंग की भी व्यवस्था की गई। बच्ची इलाज के बाद अब पूरी तरह स्वस्थ्य है।

डॉ. कृष्णकांत साहू, कॉर्डियोथोरेसिक वैस्कुलर सर्जन, आंबेडकर अस्पताल

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Posted By: Nai Dunia News Network

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