रायपुर, नईदुनिया न्यूज। होली करीब आते ही वन विभाग और पर्यावरणविदों की चिंता बढ़ गई है। बड़ी संख्या में पेड़ काटकर जलाए जाते हैं। पर्यावरण को दोहरा नुकसान होता है। ग्लोबल वॉर्मिंग में इजाफा होता है तो वायु प्रदूषण भी बढ़ जाता है। निगम अफसर बताते हैं कि रायपुर में इस साल 700 से ज्यादा जगह होलिका दहन होगा।

पिछले साल यह संख्या 506 थी। एक होली में औसतन ढाई क्विंटल लकड़ी जलती है। पिछले साल 1265 टन लकड़ी लगी होगी। रायपुर डीएफओ मर्सी बेला बताती हैं, होली में पेड़ काटने के मामले बढ़ते हैं। इस कारण पर्यावरण को काफी नुकसान होता है।

60 प्रतिशत मांग घटी

छत्तीसगढ़ टिंबर मर्चेंट एसोसिएशन के अध्यक्ष लखमशी पटेल बताते हैं कि पहले बड़े समूह लकड़ी लेने आते थे, लेकिन अब इनकी संख्या उतनी नहीं रही। पिछले सालों की तुलना में 60 प्रतिशत तक घट गई है। लोगों में जागरुकता आई है, समय की भी कमी है।

कंडे की होली के कई फायदे

पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के रसायन शास्त्री डॉ. मानसकांत देब कहते हैं कि किसी भी वस्तु का जलना गलत है पर लकड़ी के बजाए कंडे की होली के कई फायदे हैं। लकड़ी के बराबर कंडे की होली का वजन बीस गुना से ज्यादा कम होता है। इसलिए धुआं भी कम होता है। तेज आंच में कंडे तुरंत जलकर खत्म हो जाते हैं, पर लकड़ी कई दिनों तक जलकर प्रदूषण फैलाती है। बची हुई राख हवा में मिलकर और घातक हो जाती है।

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