रायपुर (नईदुनिया प्रतिनिधि)।

संसार का प्रत्येक कार्य एक सिद्धहस्त योगी की तरह लयहीन होकर किया, मगर धर्म-आराधना में काया को ही महत्व दिया, आत्मा को नहीं तो फिर साधना कैसे सिद्ध होगी। मानव जीवन अध्यात्म का खजाना है। यही सबसे सर्वोत्तम सुख है। यह संदेश साध्वी चंदनबाला ने पचपेड़ीनाका स्थित नाकोड़ा भवन में अपनी लेखनी के माध्यम से प्रवचन में दिया।

साध्वीश्री ने कहा कि हम संसार की हर कीमती वस्तु की देखभाल कर रहे हैं, लेकिन अमूल्य मानव जीवन की देखभाल नहीं कर रहे, जो अक्षय सुख का खजाना है। अभ्यास और संकल्प इन दो तत्वों के आधार से कायोत्सर्ग की सिद्धि संभव है। एक प्रसंग से बताया कि गजसुकुमाल मुनि राजसी वैभव में जन्मे, दुलारों से पले। कभी एक घंटा भी महलों में कायोत्सर्ग नहीं किया, फिर भी उनकी दीक्षा की प्रथम संध्या में ही सिर पर अंगारे पड़े और वे कायोत्सर्ग में खड़े रहे, इतने अविचल रहे कि शरीर की राख बनने से पहले ही कैवल्य ज्ञान हो गया। मरने के बाद तो चिता में शरीर जलाया जाता है, मगर उनकी तो जीते जी चिता चल रही थी। गजसुकुमाल के भव में तो उन्होंने पिछले भवों के अधूरे प्रोजेक्ट को पूर्ण किया है। यहां उन्हें अरिष्टनेमी का सान्निाध्य रूपी विमानतल मिला, दीक्षा रूपी हवाई जहाज में बैठे और तत्काल उड़ान भरकर मोक्ष रूपी मंजिल को प्राप्त किया। हमारा मन और पांच इंद्रियां चंचल हैं, वहां काया को साध पाना दुष्कर ही नहीं, महादुष्कर है। एक कायोत्सर्ग सध जाए तो इंद्रियां व मन सब सध सकते हैं।

Posted By: Nai Dunia News Network

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