जगदलपुर। छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर संभाग में आज भी चुनाव प्रचार के दौरान राजनीतिक दलों का जोर पार्टी या प्रत्याशी पर नहीं बल्कि चुनाव चिन्ह पर रहता है। इसकी सबसे बड़ी वजह शिक्षा की कमी और नक्सली खतरा है।

नक्सलवाद की वजह से बस्तर चुनाव के दौरान बेहद संवेदनशील रहता है। भौगोलिक परिस्थितियों के कारण भी जनप्रतिनिधि और राजनैतिक दलों के पदाधिकारी सभी गांवों में नहीं पहुंच पाते हैं। साक्षरता की कमी भी है।

वजह चुनाव नजदीक आते ही प्रमुख राजनैतिक दल यहां अपने प्रत्याशी नहीं बल्कि चुनाव चिन्ह पर ज्यादा फोकस करने लगती है। चुनावी सभाओं में खासकर मतदाताओं को यह समझाया जाता है कि उन्हें फलां चुनाव चिन्ह पर बटन दबा कर दल के उम्मीदवार को विजयी बनाना। प्रचार के दौरान प्रत्याशी का नाम गौण हो जाता है।

क्योंकि चिन्ह ही याद रहता है

राजनैतिक विश्लेषकों के अनुसार बस्तर में अधिकांश मतदाता अशिक्षित हैं। इनमें वे वृद्ध भी शामिल हैं जिनमें समय के साथ सुनने और प्रत्याशी का नाम याद रखने की क्षमता कम हो जाती है इस वजह से चुनाव चिन्ह के माध्यम से प्रचार ज्यादा सरल है। इवीएम में मतदाता प्रत्याशी का नाम और उसके फोटो से भले ही भ्रमित हो जाए पर चुनाव चिन्ह उन्हें जल्द आकर्षित करता है।

समय के साथ बदल रही सोच

अविभाजित मप्र के जमाने में बस्तर में केवल एक ही चुनाव चिन्ह प्रचलित था, लेकिन राज्य बनने के बाद से परिस्थितियां बदली हैं। दूसरी पार्टियों के चुनाव चिन्हों को भी लोग जानने-समझने लगे हैं। हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी लोग दो-तीन ही चुनाव चिन्ह जानते हैं।

चिन्ह पर ही जोर

मतदाताओं को आकर्षित करने राजनैतिक दल चुनाव के दौरान मतदाताओं को शर्ट की जेब में लगाने तथा वाहनों में चिपकाने के लिए चुनाव चिन्ह वाले सामग्री का वितरण करते आए हैं जिसमें प्रत्याशी का नाम गायब रहता है।