मुकर दुबे, रायपुर। बाघों की जान खतरे में है। प्रदेश के अभयारण्य क्षेत्रों में उनकी सुरक्षा पुख्ता नहीं है। यह सब वन विभाग की लापरवाही से है। शिकारी अपने पैने दांत आज भी गड़ाए हैं। पिछले 10 बरस में छत्तीसगढ़ के विभिन्न् अभयारण्यों और इनके आसपास से करीब 16 बाघों की खाल समेत अन्य अवशेष बरामद किए जा चुके हैं।

हाल ही में भोरमदेव अभयारण्य में बाघ के नाखून, दांत और खोपड़ी की बरामदगी के साथ दो तस्करों को गिरफ्तार किया गया है। जांच में इन्हें ही प्रथमदृष्टया शिकारी मानकर पूछताछ की जा रही है। समझा जाता है कि वन्य जीवों पर शिकारी फिर से निशाना साे हैं।

सुरक्षा के नाम पर खानापूरी

भोरमदेव अभयारण्य राज्य विभाजन के पूर्व कान्हा नेशनल पार्क का बफर यानी एक हिस्सा था लेकिन, छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद इसे सेंचुरी घोषित कर दिया गया। इसके संरक्षण और बाघों के मूवमेंट पर नजर रखने की जिम्मेदारी वन विभाग की हो गई लेकिन, वनरक्षक और अभयारण्य के बीट गार्ड के पदों पर नई भर्ती नहीं हो सकी। ऐसे में अभयारण्य में बाघों की सुरक्षा की कवायद नाम मात्र ही है।

बाघिन के शिकार के बाद आया था हाईकोर्ट का आदेश

15 नवंबर, 2011 को एक बाघिन को भोरमदेव अभयारण्य के जुमनापानी क्षेत्र में जहर देकर मार दिया गया था। इसके बाद बवाल मचा और वन्य जीवप्रेमियों ने हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की थी, जिस पर 28 मार्च, 2017 को मुख्य न्यायाधीश टीबीएन राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति पी. सैम कोश की युगल पीठ ने वन विभाग से शपथ-पत्र मांगकर आदेशित किया था कि इस मध्य जवाबदेह अधिकारी, आवश्यक संख्या में बीट गार्ड अन्य अधिकारी और स्टाफ तैनात किए जाएं, जो बाघों के मूवमेंट की अभयारण्य में निगरानी करें।

ये थी इंक्वायरी कमेटी की रिपोर्ट

भोरमदेव अभयारण्य में मारी गई बाघिन के बाद इंक्वायरी कमेटी ने रिपोर्ट दी थी। इसके प्रमुख बिन्दु थे- लोकल स्टाफ में सामंजस्य नहीं था और ट्रेनिंग की कमी थी। बजट समय पर नहीं दिया गया। जून 2011 से टाइगर ट्रेनिंग लेबर को भुगतान नहीं किया गया था। भोरमदेव अभ्यारण्य में अनुभव के आधार पर पोस्टिंग नहीं की गई थी। वरिष्ठ अधिकारी अभ्यारण्य क्षेत्र का दौरा नहीं करते। बैरियर पर सिर्फ लेबर पोस्टेड रहता है, जिसे टार्च व लाइट उपलब्ध करवाई गई थी।

कान्हा नेशनल पार्क के बाघ भी हो रहे शिकार

अविभाजित राज्य मध्यप्रदेश के कान्हा नेशनल पार्क का हिस्सा रहे भोरमदेव अभयारण्य क्षेत्र में वहां के बाघों का भी गाहे-बगाहे घुसना स्वाभाविक ही है, क्योंकि पूरा क्षेत्र एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। कान्हा नेशनल पार्क में 108 से अधिक बाघ हैं, जो भोरमदेव अभयारण्य की ओर आते हैं तो शिकारी इनके शिकार करने से बाज नहीं आते।

बहरहाल मौके पर तो नहीं, लेकिन शिकार के बाद इनके शरीर के अवशेष बेचे जाने की मुखबिर की सूचना पर कभी-कभार शिकारी पकड़ लिए जाते हैं। वह भी अभयारण्य के ही क्षेत्र में जो स्थानीय निवासी होते हैं। इसका जीता-जागता उदाहरण कवर्धा जिले में पकड़े गए भोरमदेव अभयारण्य क्षेत्र के दो आरोपी हैं।

प्रदेश के इन अभयारण्यों में 46 बाघ

1-भोरमदेव अभयारण्य-4

2-अचानकमार फॉरेस्ट-28

3-उदंती-सीतानदी अभयारण्य-5

4-गुस्र्घासीदास रिजर्व फॉरेस्ट-2

5-इंद्रावती रिजर्व फॉरेस्ट-7

देश में बाघों की संख्या सनवार

2006 में 1411

2010 में 1706

2014 में 2226

इनका ये है कहना

वन्य जीवप्रेमी और याचिकर्ता नितिन सिंघवी का कहना है कि हाईकोर्ट के आदेश के मुताबिक अभयारण्य में बाघों के मूवमेंट और निगरानी के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं है।

अभ्यारण्य में बाघों के मूवमेंट और निगरानी के लिए वनरक्षक और बीट गार्डों की भर्ती की गई है, जिनकी ट्रेनिंग चल रही है। इसके बाद उन्हें स्पेशल ट्रेनिंग देने के बाद शीघ्र ही पदस्थ कर दिया जाएगा।

-महेश गागड़ा, वन मंत्री

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