रायपुर। बीमा धारक की मौत के बाद भी बीमा कंपनी ने आवास ऋण की राशि जमा नहीं की। जबकि बीमाधारक ने लोन की सुरक्षा के लिए बीमा कराया था और शुल्क का भुगतान भी किया था। सेवा में लापरवाही के इस मामले में जिला उपभोक्ता फोरम ने बीमा कंपनी और फायनेंस कंपनी को सेवा में कमी का दोषी ठहराया है और लोन की राशि चुकाने का आदेश पारित किया है। उपभोक्ता को हुए मानसिक कष्ट के लिए 30 हजार रुपए देने का आदेश भी पारित किया है।

उपभोक्ता अमर जादवानी, प्रीति जादवानी और हर्षा जादवानी के पति मुरलीधर जादवानी ने पीएनबी हाउसिंग फायनेंस से 5,16,850 रुपए का लोन लिया था। लोन की सुरक्षा के लिए टाटा एआईजी लाइफ इंश्योरेंस से बीमा कराया था। 1 मार्च 2010 को पॉलिसी के संयुक्त धारक मुरलीधर जादवानी का निधन हो गया। इसकी सूचना पीएनबी फायनेंस को दी गई। फायनेंस कंपनी ने कहा कि बकाया राशि जमा करने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन अभी तक बीमा कंपनी द्वारा उक्त राशि फायनेंस कंपनी को नहीं दी गई। इसलिए फायनेंस कंपनी ने उपभोक्ताओं पर राशि वसूल करने का दबाव बनाया, जिससे प्रीति जादवानी और हर्षा जादवानी का हाइपर टेंशन के कारण स्वास्थ्य खराब हो गया। तब जाकर उपभोक्ताओं ने जिला फोरम में बीमा और फायनेंस कंपनी के खिलाफ परिवाद दायर किया। फोरम के अध्यक्ष राधाकिशन अग्रवाल ने आदेश पारित किया है कि बीमा कंपनी लोन की पूरी राशि जमा करे और उपभोक्ता को हुए मानसिक कष्ट के लिए 30 हजार रुपए अदा करे।

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