रायपुर। (राज्य ब्यूरो)। जलवायु परिवर्तन की मार से अपने परंपरागत फसलों की किस्मों, औषधियों और वनस्पतियों के अस्तित्व को बचाने के लिए राज्य सरकार हर मोर्चे पर काम कर रही है। इसके लिए राज्य जैव विविधता बोर्ड ने प्रदेश के करीब 12 हजार ग्राम पंचायतों में पहली बार जैवविविधता प्रबंधन समितियों (बीएमसी) के जरिए पीपुल्स बायोडायवर्सिटी रजिस्टर (पीबीआर) तैयार कराया है। इससे इन इलाकों में समुद्री जीवाश्म से लेकर धान, तिलहन, दलहन, पेड़-पौधे, वनस्पतियों, विभिन्न् खूबियों की मिट्टी और पेयजल स्त्रोंतों की खूबियों का उल्लेख किया गया है। आने वाले समय में यह रजिस्टर विलुप्त हो रही प्रजातियों व अन्य धरोहरों को जीवित रखने में मददगार साबित होगा।

जैव विविधता का आकलन कर रही टीम ने पाया है कि प्रदेश में दशकों पहले खेती की जा रही कुछ प्रजातियां अब विलुप्त होने की कगार पर आ गई हैं। इसे बचाने के लिए इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के अनुवांशिकी एवं पादप प्रजनन विभाग के कृषि विज्ञानियों पांच वर्षों से यहां सर्वे और अनुसंधान कर रहे हैं। अनुवांशिकी एवं पादप प्रजनन विभाग के विभागाध्यक्ष डा.दीपक शर्मा राष्ट्रीय पादप अनुवांशिकी संसाधन ब्यूरो नई दिल्ली (एनबीपीजीआर) से मदद लेकर यहां से विलुप्त फसल के किस्मों को लाकर किसानों को खेतीबाड़ी करने के लिए दिला रहे हैं।

जैव विविधता के संरक्षण में समितियों को फायदा

जैवविविधता प्रबंधन समितियों (बीएमसी) को जैव विविधता को संजोए रखने के एवज में अब राज्य सरकार यहां से क्रय होने वाली चीजों के मूल्य का दो प्रतिशत समितियों को देगी।

जैव विविधता के हाट स्पाट प्रदेश में : राज्य के बस्तर, बिलासपुर, दुर्ग, जशपुर, कबीरधाम, कांकेर, किर्बा, कोरिया, महासमुंद, कोंडागांव और राजनांदगांव जिला जैव विविधता के लिए हाट स्पाट है।

किस्मों के संरक्षण में कृषि विज्ञानियों की अहम भागीदारी

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कृषि विज्ञानी डा. दीपक शर्मा वैश्विक पर्यावरण सुविधा परियोजना(जीईएफ) के अंतर्गत बायोवर्सिटी इंटरनेशनल संयुक्त राष्ट्रसंघ की ओर से संचालित कार्यक्रम में काम कर रहे हैं। प्रदेश के रायपुर, सरगुजा, कोरिया, धमतरी में किसानों की परम्परागत फसलों को संरक्षण करने के लिए जोर दिया जा रहा है।

डा. दीपक शर्मा बताते हैं कि अनुसंधानों से पता चला है कि प्रदेश के सरगुजा के अंतर्गत बतौली ब्लाक में तापमान हर साल बदल रहा है। कोरिया के सोनहट ब्लाक में 100 किसानों को उन्ही के फसलों की किस्मों को कोडिंग करके वितरित किया गया है। यहां धान, उरद, अरहर, लघु धान्य फसले, चना, सरसो, राजगिरा और टाउ की 250 किस्मों को संरक्षित किया जा रहा है।

जलवायु परिवर्तन से भी नहीं हारीं ये परंपरागत किस्में

अनुसंधान में पता चला है कि प्रदेश में कुछ परम्परागत किस्में हैं जिन पर जलवायु परिवर्तन का असर नहीं पड़ा है। इनमें धान की किस्मों में करहनी, बिरूहली, रूद्रा धान, जलसिकी, सनचुरिया। उरद की फसल में नार उर्द, काला उर्द, करनी उर्द, अरहर में राम अरहर, सबरन अरहर, आयुष अरहर और सरसो में लुटनी सरसो, भागी सरसो की देसी किस्में जलवायु परिवर्तन के अनुरूप योग्य पाई गई हैं। लघु धान्य फसलों में धान्य फसल में जाडो कुटकी और सफेद कुटकी सूखे की अवस्था में भी उत्पादन देती हैं।

राज्य जैव विविधता बोर्ड के सदस्य सचिव अरुण कुमार पाण्डेय ने कहा, हसदेव नदी के बीच करीब एक किलोमीटर का क्षेत्र समुद्री जीवों और वनस्पतियों के जीवाश्म से भरा हुआ है। इस क्षेत्र में बाइवाल्व मोलस्का, युरीडेस्मा और एवीक्युलोपेक्टेन आदि समुद्री जीवों के जीवाश्म मौजूद हैं। इस पर हमने एक फिल्म भी बनाई है। इसी तरह अलग-अलग क्षेत्र में जैव विविधताएं हैं। इन्हें पीपुल्स बायोडायवर्सिटी रजिस्टर में दर्ज कराया है।

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के अनुवांशिकी एवं पादप प्रजनन विभाग के विभागाध्यक्ष डा. दीपक शर्मा ने कहा, एक प्रश्नोत्तरी पुस्तिका के माध्यम से 22 प्रकार के प्रश्न पूछकर किसानों से फीडबैक ले रहे हैं, जैव विविधता के लिए जरूरी है कि हर किस्म बरकरार रहे। जो किस्म विलुप्त होने की कगार पर लगती है उस पर काम किया जा रहा है।

फैक्‍ट फाइल

- 35191, वर्ग कि.मी भौगोलिक क्षेत्र प्रदेश का

- 55% (44%) वन आच्छादित क्षेत्र 2011 की स्थिति में

- 28 जिलों की कुल संख्या वर्तमान में

- 12 हजार ग्राम पंचायतों की संख्या

Posted By: Ashish Kumar Gupta

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