रायपुर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। सदरबाजार स्थित श्रीऋषभदेव मंदिर में साध्वी शुभंकरा ने कहा कि प्रभु परमात्मा के मन में जगत के जीवों के प्रति गहरा करुणा भाव था, उन्होंने जो जाना, पहले उसे स्वयं जीया और फिर उसके बाद हमें दिया। कर्मबंध उतना खतरनाक नहीं है, लेकिन उस कर्मबंध का अनुबंध बहुत अधिक खतरनाक है। साध्वीवर्या ने कहा कि पुण्य कर्म करके हल्के कर्म बंध से छुटकारा पाया जा सकता है, लेकिन यदि आपने गहरे पाप कर्म का अनुबंध कर लिया तो वह अगले अनेक भवों तक छूटने वाला नहीं।

अपने शरीर के साथ-साथ आत्मा को भी स्वस्थ बनाए रखें। काम, क्रोध, मद, लोभ आदि कसायों से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकते तो कम से कम उन कसायों का अनुबंध बिल्कुल भी नहीं करें। पुण्य कर्म का अनुबंध कर रहे हैं तो वह उचित है किंतु पाप कर्म का अनुबंध कदापि न करें। जिस प्रकार शरीर को स्वस्थ रखने के लिए उसके आवश्यक अंगों को सक्रिय रखना आवश्यक है, उसी प्रकार यदि आत्मा को स्वस्थ रखना चाहते हो तो तुम्हें निरंतर जप-तप, साधना-आराधना, स्वाध्याय आदि पुण्य कर्मों में स्वयं को सक्रिय रखना होगा।

हम जिस ज्ञान का अर्जन करते हैं उसे सुरक्षित रखने की कला हमें आनी ही चाहिए। ज्ञान की बातें सुनना, बोलना, लिखना तो भी सरल है, किंतु उसे याद रखकर आचरण में लाना और उसे सुरक्षित बनाए रखना उससे कहीं अधिक कठिन है। यदि आप अपने कर्मों को लेकर जागरूक रहेंगे, तो निश्चित ही इस तरह के कर्मों से बच सकेंगे। अंत में इसके कर्मबंधनों से भी बचा जा सकेगा।

Posted By: Shashank.bajpai

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