रायपुर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। मन में उत्तेजना न होना, शांत भाव में रहना और मुक्ति का उपाय ही समता है। मात्र चुप रहना समता नहीं है। सभी कार्य समता भाव में रहते हुए किया जा सकता है। जीवन में कोई भी परिस्थिति आए। गुरुजनों से प्राप्त होने वाले प्रसाद के अनुरूप ग्रहण करें। ये विचार कटोरातालाब स्थित राजप्रेम भवन में मुमुक्षता का मेघधनुष विषय पर जैन संत आत्मार्पित सिद्धि ने व्यक्त किया।

श्रीमद् राजचंद्र मिशन धरमपुर के तत्वावधान में राजधानी में आयोजित धर्मसभा में आत्मार्पित सिद्धि ने कहा कि मोक्ष मार्ग में निष्फलता का कारण मार्ग में भटकाव है। मोक्ष मार्ग का पहला क्रम योग्यता है। मुमुक्षु वह है, जिसे मोक्ष की इच्छा है। मुमुक्षु में दया, शांति, समता, क्षमा, सत्य, त्याग और वैराग्य के गुण होते हैं।

मुमुक्षु में सबसे पहले दया का भाव होगा। दया भाव दो प्रकार का होता है। स्व दया, पर दया। दोनों में भिन्नाता है। स्व दया- स्वयं को कषायों, से पाप भावों से बचाना। पर दया- मुमुक्षु दूसरे को न दुख देते हैं, न देख सकते हैं। मुमुक्षु दुखी को देखकर उसका दुख दूर करने का प्रयास करता है। मुमुक्षु सभी को सुखी रखने का प्रयास करता है। दया की तरह दूसरा धर्म नहीं है। ज्ञानी की दया भावना का अंत नहीं। दया भाव के लिए भगवान और ज्ञानी पुरुषों के वचनों को याद करना चाहिए।

अशांति का कारण हम स्वयं

संत सिद्धि ने शांति और समता पर भी प्रकाश डाला। शांति भीतर की प्रक्रिया है। मुमुक्षुता की शुरुआत कषायों के कम होने से होती है, कषायों के कम होने से शांति मिलती है। सच्चा मोक्षार्थी विचलित और उत्तेजित नहीं होता। वह शांत होता है। सामान्यत: लोकमान्यता है कि शांति बाहर से मिलती है, लेकिन ऐसा नहीं है। शांत रहना स्वभाव है। ज्ञानी पुरुष अपने स्वभाव में रहते हैं। अशांति परिस्थिति के कारण नहीं इच्छा के कारण मिलती है। अपनी अशांति का कारण कोई और नहीं हम स्वयं हैं। शांति के लिए ज्ञानियों की आज्ञा का पालन करना होता है।

Posted By: Ashish Kumar Gupta

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