रायपुर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। 'परिवार में कैसे जीना है, अगर ये सीखना है तो भगवान श्रीराम से सीखो। दुनिया में कैसे जीना है, अगर ये सीखना है तो भगवान श्रीकृष्ण से सीखो और मुक्ति का मार्ग कैसे हासिल करना है, अगर ये सीखना है तो भगवान महावीर से सीखो। यह संदेश संत ललितप्रभ महाराज ने आउटडोर स्टेडियम में दिया।

संत ने कहा कि हम लोग दिमाग में सोच बना लेते हैं- ये मेरे भगवान, ये तेरे भगवान। भगवान किसी धर्म के नहीं, भगवान तो सबके और पूरी मानवता के होते हैं।

हर धर्म के भगवान और गुरुओं ने जो भी बातें कहीं, वे पूरी धरती के लिए और पूरी मानवता के लिए कहीं। आगमों में जो जीने की बातें कहीं गईं हैं तो वो केवल जैनियों के लिए नहीं कही गई। गीता में जो बातें कहीं गईं हैं वे केवल हिन्दुओं के लिए नहीं कही गई हैं, पूरी मानवता के लिए कहीं गई हैं। भगवान महावीर कहते हैं- जन्म से कोई भी व्यक्ति न तो जैन होता है, न ब्राह्मण होता है, न क्षत्रिय होता, न वैश्य होता है और न ही शूद्र। आदमी जो भी होता है, अपने कर्म से होता है। केवल अपने नजरिए को बड़ा करना होता है।

संत ने कहा कि श्रीकृष्ण का जन्म तो कारागार में हुआ था। जब वे संसार से गए तो अपने जीवन के दिव्य गुणों की छाप छोड़ गए। हाथ में एक ऐसी चीज ले ली, वो थी बांसुरी। बांसुरी बड़ी गजब की चीज होती है, उसकी पहली विशेषता होती है- बिना बुलाए वो कभी बोलती नहीं। उसकी दूसरी विशेषता है- वो जब भी बोलती है तो मीठी बोलती है। प्रकृति से उन्हें कैसा प्रेम भरा रहा कि सिर पे लगाया तो कोई सोने का मुकुट नहीं लगाया, मोर पंख लगा दिया, जिससे प्रकृति का लगाव बना रहा। हाथ में जिंदगी में कभी धनुष-बाण नहीं उठाया, हाथ में बांसुरी लेकर हमेशा धरती पर मधुर तान बिखेरने में लगे रहे।

Posted By: Pramod Sahu

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