रायपुर। नईदुनिया प्रतिनिधि

संतान की लंबी उम्र और खुशहाली की कामना करते हुए माताओं ने भादो माह की षष्ठी तिथि पर बुधवार को हलषष्ठी का व्रत रखा। हलषष्ठी देवी की पूजा में छह प्रकार की भाजियों का अर्पण किया। दिन भर व्रत रखने के पश्चात बिना हल जुते उगने वाले पसहर चावल को पकाकर भोग ग्रहण किया।

यह नजारा पुरानी बस्ती स्थित महामाया मंदिर, समता कॉलोनी के हनुमान मंदिर, कंकालीपारा, आमापारा के मंदिरों में सामूहिक पूजा-अर्चना के दौरान दिखाई दिया।

मिट्टी से बनाया छोटा तालाब, उस पर हर छठ का मंडप बनाया

महिलाओं ने गड्ढा (सगरी) खोदकर उसे तालाब का रूप दिया। हर छठ गाड़कर मंडप का रूप दिया। पूजा में बेल पत्र, भैंस का दूध, दही, घी, कांसी का फूल, लाई, महुए का फूल आदि अर्पित किया। बारी-बारी से महिलाओं ने विधिवत हलषष्ठी देवी की पूजा कर कथा सुनी।

छोटे बच्चों को मारा पोता

महिलाओं ने पीली मिट्टी को सफेद कपड़े में बांधकर छोटे-छोटे बच्चों की पीठ पर हलके से थाप देकर लंबी उम्र की दुआ की। इसे पोता मारना कहते हैं। मान्यता है कि इससे बच्चों को किसी की बुरी नजर नहीं लगती। पूजा के बाद लाई, महुआ, नारियल को एक-दूसरे को भेंट किया।

पूजा के नियम जिनका पालन किया

0 भैंस के दूध का उपयोग

0 खेत में हल चलाए बिना उगने वाले चावल का भोग

0 महिलाएं उन जगहों पर नहीं गई जहां हल का उपयोग किया गया हो

0 खम्हार पेड़ के दातून से की दांतों की सफाई

0 खम्हार की लकड़ी से बने चम्मच से बनाया भोजन

0 छह प्रकार की भाजियों को मिर्च और पानी में पकाया

0 कुत्ते, पक्षी, बिल्ली, गाय, भैंस, चींटियों को भोजन पत्तों में दही के साथ परोसा

बलराम का जन्म

पं. मनोज शुक्ला ने बताया हलषष्ठी माता की पूजा करने से माता प्रसन्न होकर संतान की सुख-समृद्धि और लंबी आयु का आशीर्वाद देती हैं। यह भी मान्यता है कि इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम का जन्म हुआ था। चूंकि बलराम का अस्त्र हल था, इसलिए हल की पूजा की जाती है।